भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यदि मृग टूट भी गिरता । अपनी दौड बढाता जाता । किंतु असत्य नहीं मानता । मृगजलका भ्रम ॥ ७ ॥ वैसे जन्मसे मृत्यु पर्यंत । विषयोंमें हो सदैव त्रस्त । फिर भी अधिक हो आसक्त । करता मोह ॥ ८ ॥ पहले होती बालदशा । माता पिता इसीकी आशा । फिर स्त्री-शरीरका नशा । भुलाता सब ॥ ९ ॥ स्त्री-भोगमें तब काल हरण । होता है वार्धक्यका आगमन । तथा बनते अनुराग-स्थान । अपने बालक ॥ ७१० ॥ जन्मांध जैसे अपना घर । नहीं छोड़ता जीवन-भर । बच्चोंके विषय तिरस्कार । कभी नहीं होता ॥ ११ ॥ उसमें जान धनुर्धर । अज्ञान रहता अपार । सुन अब अन्य प्रकार । अज्ञानके ॥ १२ ॥ ११ अज्ञानका लक्षण, देहाभिमान— यह देह ही है आत्मा । बनाकर मनोधर्म । करता रहता कर्म । दिनरात ॥ १३ ॥ कभी कोई कर्माचरण । होता कम अधिक मान । तब वह स-अभिमान । फूलता सूखता ॥ १४ ॥ सिरपर देव-मूर्तिके बोझसे । अकडकर चलता पूजारी जैसे । विद्या धन वयादि अभिमानसे । अकड चलता वह ॥ १५ ॥ मैं ही हूं महा-धनवान । मेरे घरमें गुण-धन । मेरे घरका आचरण । मिलता कहां ? ॥ १६ ॥ कोई नहीं है मेरे समान । मैं ही धन-गुण विद्यावान । ऐसे गर्व-तुष्टी मान लीन । हो फिरता वह ॥ १७ ॥ व्याधिग्रस्त मनुष्य जैसे । नहीं सहता भोग वैसे । अन्योंकी भलाई उससे । सही नहीं जाती ॥ १८ ॥ ४८९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (62)