भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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गुण सारा खाता ही जाता । स्नेह सब जला डालता । रखा वहां काला करता । जैसे दीप ॥१९॥ जीवन स्पर्शता तो तडतडता । हवा लगनेसे प्राण ही तजता । जहां लगता राख कर रखता । सर्वस्वका ही ॥२०॥ अल्पस्वल्प प्रकाश देता । वैसा ही वह उष्मा देता । ऐसे दीपक-भांति होता । वह सुविद्य ॥२१॥ औषध मान दिया भी दूध । नव-ज्वरमें करता बाध । पीता है जब वह एकाधा । बनता गरल ॥२२॥ वैसे सद्गुणीका मत्सर । व्युत्पत्तिमें जो अहंकार । तप ज्ञानका है अपार । अकड उसको ॥२३॥ बिठाया पंचमको राज्यपर । या निगला खांबको अजगर । तब जैसे फूलता स-शरीर । ऐसे वह मानंस ॥२४॥ बेलन जैसे नहीं झुकता । पत्थर जैसे नहीं द्रवता । फुरसे जैसे न उतरता । मदारीके मंत्रसे ॥२५॥ ऐसा जो मनुष्य है जान । उसमें बढता अज्ञान । यह है निश्चित अर्जुन । कहता हूँ मैं ॥२६॥ १२ अज्ञानका लक्षण, अविचार- वैसे ही वह पांडुकुमार । नहीं करता कोई विचार । गृह-देह-जन्म-मृत्यू पर । अपने कभी ॥२७॥ कृतघ्न पर किया उपकार । या चोरको कर दिया व्यापार । या निर्लज्जकी की स्तुति अपार । वे भूलते जैसे ॥२८॥ उठल्लू कुत्तेको जैसे । पूंछ काट भगानेसे । फिर वहीं आता वैसे । गीली पूंछ ले ॥२९॥ मेंढक सापके मुखके अंदर । जाता है अपना सर्वस लेकर । पकडे रखता मुखमें शिकार । अपनी न सोचता ॥ ७३०॥ ज्ञानेश्वरी ४९०