भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 563

वैसे हैं स्रवते नव-द्वार । त्वचा-रोगसे गला शरीर । चितमें उसका जो विचार । नहीं करता ॥ ३१ ॥ माताके उदर गह्वरमें । पचके मलके गर्तमें । नव माह तक जठरमें । ऊबा था जो ॥ ३२ ॥ गर्भकी थी जो वह व्यथा । जन्मके बाद वही कथा । यह सब ही है सर्वथा । भूलके बैठा ॥ ३३ ॥ मल मूत्र लिप्त बालक । गोदमें देख स-कौतुक । न घिनता सोचके शोक । करता अपना ॥ ३४ ॥ कलका जन्म जो गया । आजका भी जन्म आया । सोच नहीं आया गया । इसका कभी ॥ ३५ ॥ वैसे ही सुन तू अर्जुन । तारुण्यका कर दर्शन । न सोचता उसका मन । मृत्युकी बात ॥ ३६ ॥ जीवनका अति विश्वास । मृत्युके अस्तित्वका भास । सदैव उसका मानस । भूलता जाता ॥ ३७ ॥ होते हैं डबरेके मीन जैसे । यह नहीं सूखेगा मान ऐसे । उसीमें पडे रहते हैं वैसे । न जाते गहरेमें ॥ ३८ ॥ सुनकर किरातका गान । मृग करते व्याध-दर्शन । आमिष लोभसे जैसे मीन । निगलता कांटा ॥ ३९ ॥ जैसे देख ज्योतिका जगमग । जला लेता अपनेको पतंग । नहीं जानता है जलेगा अंग । मोहमें वैसे ॥ ७४० ॥ निद्रा-सुखमें जैसे गंवार । नहीं देखता जलता घर । नहीं जान अन्नमें जहर । खाता अज्ञ ॥ ४१ ॥ वैसे जीवनका रूप लेकर । आयी मृत्यू यह न जानकर । पडता विषय-सुख भंवर । मस्त हो क्षणिक ॥ ४२ ॥ दिन-रात जो खपता । शरीरको है बढाता । सुख वैभव मानता । विषयका सत्य ॥ ४३ ॥ ४९१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग