भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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दक्ष हुआ यहां चातुर्य । आया है प्रमेयमें माधुर्य । सुखका हुआ है ऐश्वर्य । परिपुष्ट ॥३५॥ माधुर्यमें मधुरता । श्रंगारमें सुरेखता । प्रथाओंकी सुरूपता । दीखती यहां ॥३६॥ कलामें आयी है कुशलता । वैसे ही पुण्यमें तेजस्विता । नष्ट हुये दोष स्वभावतः । जनमेजयके ॥३७॥ क्षणभर देखनेसे लगता । रंगमें बढ़ आयी सु-रंगता । गुणमें अंकुरायी सुजनता । सामर्थ्य रूप ॥३८॥ भानु-तेजसे धवल । त्रिलोक दीखे उज्ज्वल । व्यास-मतिके चंगुल । शोभता विश्वपे ॥३९॥ सु-क्षेत्रमें पड़ा हुआ बीज । अपने आप फैला सहज । भारतमें उमड़ा है तेज । पुरुषार्थका ॥४०॥ नगरमें बसा नागरिक । रहता है जैसा सविवेक । वैसे व्यासोक्तिसे हुआ नेक । सभी विश्व ॥४१॥ अथवा तारुण्यारंभमें जैसे । खिलती लावण्य कलिका वैसे । आता अंगनाके अंगांगमेंसे । नित नव बहार ॥४२॥ या वसन्तागमनसे उद्यानमें । आता है बहार प्रति पल्लवमें । सौंदर्यकी खान खुलती वनमें । वैसे ही जान ॥४३॥ अथवा घनीभूत सुवर्ण । देखनेमें है जो साधारण । दीखे भूषण असाधारण । उसी भांति ॥४४॥ व्यासोक्तिके अलंकारार्थ । इच्छित सौंदर्य प्राप्त्यर्थ । इतिहास है आश्रयार्थ । आया भारतके ॥४५॥ या अपनी प्रतिष्ठाके लिये । अल्पत्वको है स्वीकार किये । पुराण आख्यान रूप लिये । आये भारतमें ॥४६॥ तभी जो महा-भारतमें नहीं । नहीं है त्रिभुवनमें कहीं । कहते हैं सब ही तभी यही । व्यासोच्छिष्ट जगत्रय ॥४७॥ जगतमें कथा सरस ऐसी । परमार्थकी है जन्म-भूमि-सी । मुनि वाणिसे अमृतमय-सी । सुनी जनमेजयने ॥४८॥ ज्ञानेश्वरी ४