ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु-वंदन — मेरे हृदयमें श्री सद्गुरु। जिसने तारा संसार-पूर । इससे है विशेष आदर। विवेकपे ॥२२॥ जैसे अंजन पड़ा आखोंमें। फूटे नव-अंकुर दृष्टिमें । लगा टोह दस दिशाओंमें। महानिधिका ॥२३॥ अथवा चिंतामणि आया करमें। सदा विजयवृत्ति बसी मनमें । वैसे हूं पूर्ण-काम निवृत्तिमें। कहता ज्ञानदेव ॥२४॥ इसीसे श्रीगुरुको भजा जानके। उससे ही सतत-कृतार्थ होके । सींचनेसे जैसे मूलको वृक्षके। खिलते शाखा-पल्लव ॥२५॥ त्रिभुवनके तीर्थ जिसमें। डूबते हैं सदा सागरमें । या अमृतके रसास्वादमें। आते रस सकल ॥२६॥ वैसे आगे आगे जो रहता है। नमन किया जिसे श्रीगुरु है । अभिलषित मनकी रुचि है। पूर्ण करता जो ॥२७॥ महाभारतका वर्णन— सुनो अब कथा जो गहन। सब कौतुकका जन्मस्थान । अथवा अभिनव उद्यान । विवेक तरुका ॥२८॥ सभी सुखोंका जो है आदि। सब तत्वोंका महोदधि । नवरसोंका जो सुधाब्धि । है परिपूर्ण ॥२९॥ परमधाम प्रकट । विद्याओंका मूलपीठ । सभी शास्त्रोंमें जो श्रेष्ठ। अशेषका ॥३०॥ सभी धर्मोंका नैहर। सज्जनोंका है जिव्हार । लावण्य-रत्न भांडार । शारदाका ॥३१॥ , या प्रकटी है त्रिभुवनमें । भारती स्वयं कथा-रूपमें । स्फुरण होके व्यास -चित्तमें । जो है महामति ॥३२॥ या है यह काव्यराज । ग्रंथ-गुरुत्वका ताज । रसमें रसत्व आज । आया उमड़ ॥३३॥ सुनो एक और महता । शब्दोंमें आयी शास्त्रीयता । बढ़ी महाबोध मृदुता । इस ग्रंथसे ॥३४॥ ३ अर्जुनविषादयोग