भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

व्यासादिकोंका शुद्धज्ञान । शोभता मेखला समान । उसकी दिशा है महीन । झलकती सदा ॥९॥ कहलाते जो षड्दर्शन । जैसे भुजदंड महान । तभी है असंगत-पूर्ण । आयुध करमें ॥१०॥ तर्क ही है परशु । नीति-भेद अंकुश । वेदांत महारस । शोभता मोदक ॥११॥ एक हाथमें हैं दन्त । स्वभावसे ही खंडित । जो बौद्धमत संकेत । वार्तिकोंका ॥१२॥ सहज सत्कारवाद । है पद्मकर वरद । धर्मप्रतिष्ठामें सिद्ध । अभयहस्त ॥१३॥ विवेकवंत सुविमल । वही शुंड-दंड सरल । है परमानंद केवल । महासुखका ॥१४॥ अजी संवाद है दशन । जो है समता शुभ्रवर्ण । देव उन्मेषसूक्ष्मेक्षण । विघ्नराज ॥१५॥ पूर्व उत्तर मीमांसा मान । उसके हैं दो श्रवणस्थान । मुनिमन बोधामृत पान । करते अमरसे ॥१६॥ प्रमेयप्रवालसुप्रभ । द्वैत अद्वैत हैं निकुंभ । तुल्यबल हैं जो सुलभ । मस्तक पर ॥१७॥ उस पर हैं दस उपनिषद् । जिसके उदार ज्ञान-मकरंद । मुकुट पर जो सुमन-सुगंध । सुहाते हैं ऐसे ॥१८॥ अकार चरण युगल । उकार उदर विशाल । मकार है महामंडल । मस्तकाकार ॥१९॥ जहां ये तीनो हुए एक । शब्दब्रह्म प्रकटा नेक । गुरु-कृपासे जाना देख । यह आदिबीज ॥२०॥ सरस्वती वंदन— अजी अभिनव वाग्विलासिनी । जो चातुर्य-अर्थ-कलाकामिनी । वह है शारदा विश्व-मोहिनी । नमस्कार मेरा ॥२१॥ ज्ञानेश्वरी २