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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

व्यासादिकोंका शुद्धज्ञान । शोभता मेखला समान । उसकी दिशा है महीन । झलकती सदा ॥९॥ कहलाते जो षड्दर्शन । जैसे भुजदंड महान । तभी है असंगत-पूर्ण । आयुध करमें ॥१०॥ तर्क ही है परशु । नीति-भेद अंकुश । वेदांत महारस । शोभता मोदक ॥११॥ एक हाथमें हैं दन्त । स्वभावसे ही खंडित । जो बौद्धमत संकेत । वार्तिकोंका ॥१२॥ सहज सत्कारवाद । है पद्मकर वरद । धर्मप्रतिष्ठामें सिद्ध । अभयहस्त ॥१३॥ विवेकवंत सुविमल । वही शुंड-दंड सरल । है परमानंद केवल । महासुखका ॥१४॥ अजी संवाद है दशन । जो है समता शुभ्रवर्ण । देव उन्मेषसूक्ष्मेक्षण । विघ्नराज ॥१५॥ पूर्व उत्तर मीमांसा मान । उसके हैं दो श्रवणस्थान । मुनिमन बोधामृत पान । करते अमरसे ॥१६॥ प्रमेयप्रवालसुप्रभ । द्वैत अद्वैत हैं निकुंभ । तुल्यबल हैं जो सुलभ । मस्तक पर ॥१७॥ उस पर हैं दस उपनिषद् । जिसके उदार ज्ञान-मकरंद । मुकुट पर जो सुमन-सुगंध । सुहाते हैं ऐसे ॥१८॥ अकार चरण युगल । उकार उदर विशाल । मकार है महामंडल । मस्तकाकार ॥१९॥ जहां ये तीनो हुए एक । शब्दब्रह्म प्रकटा नेक । गुरु-कृपासे जाना देख । यह आदिबीज ॥२०॥ सरस्वती वंदन— अजी अभिनव वाग्विलासिनी । जो चातुर्य-अर्थ-कलाकामिनी । वह है शारदा विश्व-मोहिनी । नमस्कार मेरा ॥२१॥ ज्ञानेश्वरी २

गुरु-वंदन — मेरे हृदयमें श्री सद्गुरु। जिसने तारा संसार-पूर । इससे है विशेष आदर। विवेकपे ॥२२॥ जैसे अंजन पड़ा आखोंमें। फूटे नव-अंकुर दृष्टिमें । लगा टोह दस दिशाओंमें। महानिधिका ॥२३॥ अथवा चिंतामणि आया करमें। सदा विजयवृत्ति बसी मनमें । वैसे हूं पूर्ण-काम निवृत्तिमें। कहता ज्ञानदेव ॥२४॥ इसीसे श्रीगुरुको भजा जानके। उससे ही सतत-कृतार्थ होके । सींचनेसे जैसे मूलको वृक्षके। खिलते शाखा-पल्लव ॥२५॥ त्रिभुवनके तीर्थ जिसमें। डूबते हैं सदा सागरमें । या अमृतके रसास्वादमें। आते रस सकल ॥२६॥ वैसे आगे आगे जो रहता है। नमन किया जिसे श्रीगुरु है । अभिलषित मनकी रुचि है। पूर्ण करता जो ॥२७॥ महाभारतका वर्णन— सुनो अब कथा जो गहन। सब कौतुकका जन्मस्थान । अथवा अभिनव उद्यान । विवेक तरुका ॥२८॥ सभी सुखोंका जो है आदि। सब तत्वोंका महोदधि । नवरसोंका जो सुधाब्धि । है परिपूर्ण ॥२९॥ परमधाम प्रकट । विद्याओंका मूलपीठ । सभी शास्त्रोंमें जो श्रेष्ठ। अशेषका ॥३०॥ सभी धर्मोंका नैहर। सज्जनोंका है जिव्हार । लावण्य-रत्न भांडार । शारदाका ॥३१॥ , या प्रकटी है त्रिभुवनमें । भारती स्वयं कथा-रूपमें । स्फुरण होके व्यास -चित्तमें । जो है महामति ॥३२॥ या है यह काव्यराज । ग्रंथ-गुरुत्वका ताज । रसमें रसत्व आज । आया उमड़ ॥३३॥ सुनो एक और महता । शब्दोंमें आयी शास्त्रीयता । बढ़ी महाबोध मृदुता । इस ग्रंथसे ॥३४॥ ३ अर्जुनविषादयोग

दक्ष हुआ यहां चातुर्य । आया है प्रमेयमें माधुर्य । सुखका हुआ है ऐश्वर्य । परिपुष्ट ॥३५॥ माधुर्यमें मधुरता । श्रंगारमें सुरेखता । प्रथाओंकी सुरूपता । दीखती यहां ॥३६॥ कलामें आयी है कुशलता । वैसे ही पुण्यमें तेजस्विता । नष्ट हुये दोष स्वभावतः । जनमेजयके ॥३७॥ क्षणभर देखनेसे लगता । रंगमें बढ़ आयी सु-रंगता । गुणमें अंकुरायी सुजनता । सामर्थ्य रूप ॥३८॥ भानु-तेजसे धवल । त्रिलोक दीखे उज्ज्वल । व्यास-मतिके चंगुल । शोभता विश्वपे ॥३९॥ सु-क्षेत्रमें पड़ा हुआ बीज । अपने आप फैला सहज । भारतमें उमड़ा है तेज । पुरुषार्थका ॥४०॥ नगरमें बसा नागरिक । रहता है जैसा सविवेक । वैसे व्यासोक्तिसे हुआ नेक । सभी विश्व ॥४१॥ अथवा तारुण्यारंभमें जैसे । खिलती लावण्य कलिका वैसे । आता अंगनाके अंगांगमेंसे । नित नव बहार ॥४२॥ या वसन्तागमनसे उद्यानमें । आता है बहार प्रति पल्लवमें । सौंदर्यकी खान खुलती वनमें । वैसे ही जान ॥४३॥ अथवा घनीभूत सुवर्ण । देखनेमें है जो साधारण । दीखे भूषण असाधारण । उसी भांति ॥४४॥ व्यासोक्तिके अलंकारार्थ । इच्छित सौंदर्य प्राप्त्यर्थ । इतिहास है आश्रयार्थ । आया भारतके ॥४५॥ या अपनी प्रतिष्ठाके लिये । अल्पत्वको है स्वीकार किये । पुराण आख्यान रूप लिये । आये भारतमें ॥४६॥ तभी जो महा-भारतमें नहीं । नहीं है त्रिभुवनमें कहीं । कहते हैं सब ही तभी यही । व्यासोच्छिष्ट जगत्रय ॥४७॥ जगतमें कथा सरस ऐसी । परमार्थकी है जन्म-भूमि-सी । मुनि वाणिसे अमृतमय-सी । सुनी जनमेजयने ॥४८॥ ज्ञानेश्वरी ४

अद्वितीय औ' उत्तम । पवित्रैक निरुपम । परम मंगलधाम । सुनिये अब ॥ ४९ ॥ श्रीमद्भगवद्गीता महिमा- भारत कमल पराग । गीताख्यानका है प्रसंग । कहते हैं स्वयं श्रीरंग । अर्जुनसे ॥ ५० ॥ अथवा शब्द ब्रह्मान्धि । मथ लिया व्यास-बुद्धि । निचोड़ है निरवधि । नवनीत यह ॥ ५१ ॥ फिर ज्ञानाग्नि-संपर्कसे । तपाया तीव्र विवेकसे । हुवा पूर्ण परिपाकसे । सुगंधित घृत ॥ ५२ ॥ विरक्त उसकी अपेक्षा करते । संत उसका अनुभव करते । तथा पारंगत रमते रहते । सोऽहं भावमें ॥ ५३ ॥ सुनना उसे भक्तिमें । वंद्य है जो त्रैलोक्यमें । कहा है भीष्म-पर्वमें । श्रीहरिने ॥ ५४ ॥ उसको श्रीमद्भगवद्गीता कहते । ब्रह्मेश उसकी प्रशंसा करते । सनकादिक हैं सेवन करते । अति आदरसे ॥ ५५ ॥ जैसे शरद्‌चंद्रकलामें । होते सुधाकण साथमें । उठाते कोमल चोंचमें । चकोर-शावक ॥ ५६ ॥ उस पर भी सुन श्रोता । प्रतीत करो यह कथा । चितमें अति चेतनता । लाकरके तुम ॥ ५७ ॥ शब्दोंके बिन है बोलना । इंद्रियोंके बिन भोगना । बोलके बिन उलझना । प्रमेयोंसे ॥ ५८ ॥ भ्रमर जैसा पराग ले जाते । किंतु कमल दल न जानते । इस भांति अनुभव करते । ग्रंथको यहां ॥ ५९ ॥ अथवा अपना स्थान नहीं छोडते । आलिंगन करते चंद्रोदय होते । ऐसा प्रेम भोग भोगना है जानते । कुमुदिनि समान ॥ ६० ॥ ऐसी ही गंभीरतासे । स्थिर अन्तःकरणसे । जाने जो संपन्नतासे । युक्त मन हो ॥ ६१ ॥ ५ अर्जुनविषादयोग

जो हैं अर्जुनके साथ । बैठ सकते हैं सन्त । कृपया सुने ये बात। दत्त-चित्त हो ॥ ६२ ॥ श्रोताओंको नमन— आपका हृदय है अति कोमल । तभी निकले हैं ये प्रीतिके बोल । वैसे मेरी विनय अति सरल । चरण युगलमें ॥ ६३ ॥ जैसे स्वभाव माता-पिताका । तोतली बोली सुननेका । सानंद अपने आपत्यका । वैसे ही यहां ॥ ६४ ॥ वैसे किया मेरा स्वीकार । सज्जनोंने अपनाकर । कम अधिक क्षमाकर । उपेक्षासे ॥ ६५ ॥ कविकी नम्रता— किंतु दूसरे ही अपराधका । क्षमा प्रार्थी हूं मैं यहां आपका । गीतार्थ कथनके प्रयासका । सुनियेजी ॥ ६६ ॥ न सोचकर अपनी क्षमता । चित जो यह साहस करता । जैसे भानु-तेजमें चमकता । खद्योत जैसे ॥ ६७ ॥ अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर । वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ६८ ॥ यदि है आकाश लपेटना । उससे अधिक बडा होना । ऐसा है यह मेरा करना । विचारान्तमें ॥ ६९ ॥ ऐसी है गीतार्थकी महत्ता । शंभु स्वयं कथन करता । प्रश्न करती भवानी माता । चमत्कृत होके ॥ ७० ॥ शिव कहते हैं उमासे । अथाह तव रूप जैसे । भगवद्गीता तत्व वैसे । नित्य नूतन ॥ ७१ ॥ यह है वेदार्थ सागर । उस निद्रस्थका है घोर । कहता यह सर्वेश्वर । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७२ ॥ ऐसा है जो अगाध । भ्रमते जहां वेद । वहां मैं मतिमंद । कहूंगा क्या ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६

यह अपार कैसे लपेटेगा । महातेजको कैसे उजालेगा । आकाश कैसे मुट्ठीमें कसेगा । यह क्षुद्र जीव ॥ ७४ ॥ गुरु कृपाकी महिमा— किंतु यहां है एक आधार । उसीका है मुझे महा-धीर । अनुकूल है श्रीगुरुवर । कहता ज्ञानदेव ॥ ७५ ॥ नहीं तो मैं अति-मूर्ख । वैसे ही है अविवेक । सन्त-कृपाका दीपक । करता सोज्वल ॥ ७६ ॥ हो जाता है कनक लोहेका । सामर्थ्य है यह पारसका । मृतको जीवित करनेका । अमृतमें जैसे ॥ ७७ ॥ प्रकटती जब सरस्वती । गूंगेको भी है वक्ता करती । केवल वस्तु - सामर्थ्य-शक्ति । अचरज नहीं ॥ ७८ ॥ मैं गुरुकी कठपुतली हूं— कामधेनु है प्रसन्न जिसे । अप्राप्य नहीं है कछु उसे । नहीं तो प्रवृत्त होता कैसे । इस कार्यमें मैं ॥ ७९ ॥ अपूर्णको पूर्ण कर लेना । अधिकको न्यून मान लेना । ऐसे ही मुझे संभाल लेना । विनय है यह ॥ ८० ॥ अजी ! आप अब सुनियेगा । आप कहें सो तुतलाऊंगा । नचावे वैसा ही मैं नाचूंगा । सूत्रधार जो ॥ ८१ ॥ वैसे मैं अनुगृहीत । साधुओंसे निरूपित । आपसे हे अलंकृत । अपनत्वमें ॥ ८२ ॥ गुरु प्रसादकी सूचना — श्रीगुरु कहते अब । न कह तू यह सब । कर ग्रंथका प्रारंभ । तुरंत ही ॥ ८३ ॥ आज्ञांस निवृत्तिका दास । कहता हो परमोल्हास । देके मनको अवकाश । सुनो अब ॥ ८४ ॥ ७ अर्जुनविषादयोग

अध्याय २: सांख्ययोग

धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥ मोहग्रस्त धृतराष्ट्रकी जिज्ञासा— मोहित है जो पुत्र-स्नेहसे । धृतराष्ट्र पूछे संजयसे । वृत्तांत कहो अति त्वरासे । कुरुक्षेत्रका ॥ ८५ ॥ कहते जिसे धर्म - क्षेत्र । वहां मेरे औ' पांडुपुत्र । हुये युध्दार्थ जो एकत्र । करते हैं क्या ? ॥ ८६ ॥ तभी उन्होने परस्पर । किया क्या इस अवसर । कहो जी अब सविस्तर । मुझसे तुम ॥ ८७ ॥ संजय उवाच दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥ दुर्योधन उवाच पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३ ॥ धृतराष्ट्रने कहा पवित्र कुरु-क्षेत्रपे हमारे और पांडुके । लड़ायीके लिये आये हुवा क्या कह संजय ॥ १ संजयने कहा निहारी पांडवी-सेना सजी कौरवने जब । तब जा गुरुके पास उनसे बात ये कहीं ॥ २ ॥ दुर्योधनने कहा गुरुजी आपका शिष्य प्रवीण द्रुपदात्मज । रचा जो इसने व्यूह देखें पांडव सैन्यका ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८

युद्धवर्णन— “सुनो” तब वह संजय बोला। पांडवी सेनाने किया हमला। जैसे महा-प्रलयमें है फैला। कृतांत मुख ॥ ८८ ॥ सेना मानो महापूर जैसे। चढ आती है जो उग्रतासे। उबलता कालकूट जैसे। रोके कौन ? ॥ ८९॥ अथवा जैंस बड़वानल भड़का। उसको साथ मिला प्रलय-वातका। उठा जो शोषण करके सागरका। आकाश तक ॥ ९० ॥ ऐसा वह दल दुर्धर। व्यूह रचनामें चतुर। जिससे अति भयंकर। दीखता है॥ ९१ ॥ जिसे देखकर दुर्योधन। उपेक्षा करके अनमन। जैसे न गिनता पंचानन। गज-समूहको ॥ ९२ ॥ गया वह गुरुके पास। बात कही है स-उल्हास। उछला सेनाका उल्हास। देखो पांडवोंकी ॥ ९३ ॥ गिरि-दुर्ग चलते हैं जैसे। विविध व्यूह बनते वैसे। रचा अति कुशलतासे। द्रुपद-पुत्रने ॥९४॥ किया जो आपने ही शिक्षित। विद्यासे किया है ज्ञानवंत। रचा सैन्य-सिंह सुशोभित। उसने देखें ॥ ९५॥ अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुन समायुधि। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥ और भी हैं असाधारण। शस्त्रास्त्रमें हैं जो प्रवीण। क्षात्र-धर्ममें हैं निपुण। अन्यवीर ॥ ९६ ॥ जो हैं बल प्रौढ़ि पौरुषमें। भीम अर्जुनकी समतामें। कहूंगा मैं इस प्रसंगमें। नाम उनके ॥ ९७॥ यहां युयुधानु सुभट। आया वह वीर विराट। वैसे ही महारथी श्रेष्ठ। द्रुपदराज ॥ ९८॥ यहां शूर धनुर्धारी जैसे हैं भीम अर्जुन। महारथी जो द्रुपद विराट नृप सात्यकी ॥ ४ ॥ ९ अर्जुनविषादयोग (२)

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगवः ॥ ५ ॥ युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥ चेकितान धृष्टकेतु । काशीश्वर है विक्रांत । उत्तमौजा नृपनाथ । तथा शैव्य है ॥ ९९ ॥ अजी यहां कुंतिभोज है । युधामन्यु भी आगया है । पुरुजित् आदि राजा हैं । सबको देखलें ॥ १०० ॥ यह सुभद्रा हृदय नंदन । पौरुषमें मानो नव अर्जुन । हैं अभिमन्यु कहे दुर्योधन । गुरु द्रोणसे ॥ १ ॥ वैसे ही द्रौपदी कुमार । सभी महारथी वीर । मैं नहीं जानु हैं अपार । यहां वीर लोग ॥ २ ॥ अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपस्य समितिंजयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ शूर है जो धृष्टकेतु कास्य औ' चेकितान भी । पुरुजित् कुंतिभोजीय तथा शैब्य नरोत्तम ॥ ५ ॥ वीर हैं उत्तमौजा भी युधामन्यु पराक्रमी । सौभद्र और ये पुत्र द्रोपदीके महारथी ॥ ६ ॥ अपने पक्षके जो हैं सेनाके मुख्य नायक । कहता हूं सुने आप आचार्य चित्त देकर ॥ ७ ॥ स्वयं आप तथा भीष्म यशस्वी कृप कर्ण हैं । सौमदत्ति अश्वत्थामा जयद्रथ विकर्ण भी ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी १०

अब अपने दलके नायक । हैं जो दृढ वीर तथा सैनिक । सुनिये सभी ध्यान पूर्वक । कहता हूं मैं ॥ ३ ॥ आप तथा अन्य जो हैं । मुख्य रुपसे दीखते हैं । यह केवल संक्षेप है । कहता हूं सुनिये ॥ ४ ॥ यह है भीष्म गंगा नंदन । प्रतापमें हैं भानु समान । हैं जो रिपु-गज-पंचानन । कर्ण महाबीर ॥ ५ ॥ इसमें एकेकका मनो-व्यापार । करता है विश्वोत्पत्ति औ' संहार । यह कृप आचार्य है महावीर । अपर्याप्त हैं क्या ? ॥ ६ ॥ यह विकर्ण भी वीर है । यह अश्वत्थामा खड़ा है । हियमें जिसका डर है । कृतांतके भी ॥ ७ ॥ सौमदत्ति है समितिंजय । करने आये मेरी विजय । धाता न जाने जिनका शौर्य । ऐसे हैं अनेक ॥ ८ ॥ अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ जो शस्त्र-विद्या पारंगत । तथा मंत्रावतार मूर्त । अस्त्रमात्रके जो अभ्यस्त । पूर्ण रुपसे ॥ ९ ॥ अप्रतिम जो मल्ल-जगतमें । पूर्ण प्रताप जिनके तनमें । परंतु सर्व-प्राणं जो मुझमें । लगाया है ॥ ११० ॥ जैसे है पतिव्रताका हृदय । पति बिन न स्पर्शे अन्य काया । वैसे सर्वस्व है मुझको दिया । इन सुभटोंने ॥ ११ ॥ हमारे कार्य सिध्यर्थ । इन्होने दिया जीवित । ऐसे हैं ये स्वामि-भक्त । निस्सीम ॥ १२ ॥ हैं ये युध्द कलामें निपुण । यश प्राप्तिमें दक्ष महान । क्षात्र नीतिका है जनन । हुआ इनसे ॥ १३ ॥ अनेक दूसरे वीर मैरे हित सभी तज । सजे हैं सब शस्त्रोंसे रणमें दक्ष जो सदा ॥ ९ ॥ ११ अर्जुनविषादयोग

ऐसे सर्वांग पूर्ण वीर । अपने दलमें अपार । गणनाका नहीं है पार । कहें कितने ॥ १४ ॥ अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ सब क्षत्रियमों श्रेष्ठ । विश्व विख्यात सुभट । भीष्मने सजाया पीठ । सेनापतिका ॥ १५ ॥ इन्होंने अपने सामर्थ्यसे । रचाया सेनाके दुर्ग जैसे । इनके सम्मुख विश्व जैसे । है कःपदार्थ ॥ १६ ॥ पहले ही है महासागर । सबको ही है वह दुस्तर । फिर वडवानल प्रखर । विराजा वहां ॥ १७ ॥ या प्रलय-वन्हि-महावात । दोनोंका हुआ समान साथ । ऐसे सैन्यका है गंगा-सुत । सेनापति बना ॥ १८ ॥ इससे अब कौन लड़ेगा । पांडव दल ओछा पड़ेगा । कहिये उसका क्या चलेगा । इनके सम्मुख ॥ १९ ॥ भीमसेन बडा बोथा । बना है जो सेनानाथ । ऐसा कह कर बात । छोडी उसने ॥ १२० ॥ अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षंतु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ पुनरपि बोले दुर्योधन । सुनो बात तुम सभी जन । सैन्य सहित हो सावधान । रहे अपना ॥ २१ ॥ जिसकी जो अक्षोहिणी सेनामें । जिसके साथ भिडेगी रणमें । सन्नध्द करो नियत स्थलमें । महारथीके सम्मुख ॥ २२ ॥ अपार अपनी सेना जो है रक्षित भीष्मसे । थोडीसी उनकी सेना जिसका भीम रक्षक ॥ १० ॥ मिला जो जिनको स्थान डटके उस स्थानपे । करेंगे भीष्मकी रक्षा सब ही सब ओरसे ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी १२

सेना अपनी संभालना । भीष्मके आधीन रहना । द्रोणसे कहा जी ! देखना । आप यह सकल ॥ २३ ॥ एककी रक्षा करना । मैं ही हूं ऐसा मानना । यही सच्चा है अपना । दल भार सारा ॥ २४ ॥ तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥ राजाकी इस बातसे । भीष्मने भी संतोषसे । किया जो महावेगसे । सिंहनाद ॥ २५ ॥ गूंजा जो वह अद्भुत । दोनो सेनामें आद्यंत । प्रतिध्वनि है ध्वनित । चहूं दिशामें ॥ २६ ॥ उस प्रतिध्वनिके साथ । वीरवृत्तिसे हो ज्वलंत । भीष्मदेवने भी घोषित । किया दिव्य शंख ॥ २७ ॥ दोनो ही नाद मिले घोर । मानो हुए त्रिलोक बधिर । जैसा पड़ा हो टूट कर । आकाश सर्व ॥ २८ ॥ कंपित हुआ अंबर । उछल उठा सागर । प्रक्षुभित चराचर । भयसे महा ॥ २९ ॥ महा घोषसे उठे गजर । जिससे भरे गिरिकंदर । हुई सेना सब रणातुर । स्फुरित हो महा ॥ ३० ॥ ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥ बढाने उनका हर्ष करके सिंह-गर्जन । प्रतापी वृद्ध दादाने बजाया शंख जोरसे ॥ १२ ॥ तब है शंख भेर्यादि रणवाद्य विचित्र जो । बजे जब सभी साथ हुवा शब्द भयंकर ॥ १३ ॥ १३ अर्जुनविषादयोग

रणवाद्य बजे जो एकत्र। भय फैलाते हुये सर्वत्र । आया हो जैसे प्रलय सत्र। इसी क्षणमें ॥ ३१ ॥ बज उठे बड़े ढोल । शंख झांज जो शिथिल । भयंकर कोलाहल । सुभटोंका ॥ ३२ ॥ ताल ठोकते आवेशसे । गोहारते त्वेश द्वेषसे । हाथी घोडे हैं उन्मादसे । अनावर ॥ ३३ ॥ कायरोंकी वहां क्या बात । कांच दिल गये उडत । कांप उठा स्वयं कृतांत । खडा न रहा ॥ ३४ ॥ कितनोंके बैठे हृदय । कितनोंका प्राण ही जाय । वीरोंकी कांपती है काया । उस नादसे ॥ ३५॥ ऐसा भयंकर रण गर्जन । सुन अकुलाया चतुरानन । प्रलय आ गया क्या इसी क्षण । बोले देव ॥ ३६ ॥ यह बात हुयी स्वर्गमें । आक्रोश देखके रणमें । यहां है पांडव दलमें । हुआ क्या ? ॥ ३७ ॥ ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥ रथ था जो विजय-गर्भका । या भांडार था महातेजका । और था चार श्वेत अश्वोंका । गरुड समान ॥ ३८ ॥ आया जैसा मेरु पंखोंका । वैसा आया रथ जो बांका । छितराते दिव्य शोभाका । प्रकाश सर्वत्र ॥ ३९ ॥ अश्व चालक स्वयं भगवान । वैकुंठका जो स्वामी महान । उस रथका है गुणवर्णन । करना ही क्या ॥ १४० ॥ ध्वज स्तंभ पर वानर । जो है मूर्त्तिमान शंकर । सारथी स्वयं शार्गधर । अर्जुनका ॥ ४१ ॥ यहां धवल घोडोंके महान रथमें बसे । कृष्ण अर्जुनने फूंके अपने दिव्य शंख भी ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४

देखो नवल उस प्रभुका । अद्भुत प्रेम है जो भक्तोंका । सारथ्य करता है पार्थका । विश्वपति ॥ ४२ ॥ पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः । पौंड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥ पीछे किया है भक्तको । आगे किया अपनेको । फूंका है पांचजन्यको । लीलासे तब ॥ ४३ ॥ उसका घोष है भयंकर । गूंजत रहा जो चहूं ओर । जैसे निगलता दिनकर । उगते ही नक्षत्र ॥ ४४ ॥ इसमें डूब गया गर्जन । कौरव दल-रव महान । जिससे विश्व-कंपायमान । था क्षण पूर्व ॥ ४५ ॥ इसके क्षणकाल बाद । हुआ जो गहरा निनाद । देवदत्तका गूंजा नाद । अर्जुनके ॥४६ ॥ दोनो शब्द प्रचंड । गूंजे जब अखंड । मानो टूटा ब्रह्मांड । शतधा होके ॥ ४७ ॥ उबल उठा तब वृकोदर । जैसे खौला हुआ महासागर । किया शंखनाद जो भयंकर । पौंड्रू नामके ॥ ४८ ॥ अनंतविजयं राजा कुन्ती पुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोष मणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥ गरजा महाप्रलय जलधर । गूंज उठा शब्द अतीव गंभीर । तब अनंत विजय युधिष्ठिर । बजाने लगे ॥ ४९ ॥ पांचजन्य हृषीकेश पार्थने देवदत्तको । बजाया भीमने पौंडू शंखको बलसे महा ॥ १५ ॥ फूंका अनंतविजय शंख भी धर्मराजने । वैसे ही माद्रि पुत्रोंने सुघोष मणिपुष्पक ॥ १६ ॥ १५ अर्जुनविषादयोग

तथा नकुलने सुघोष। सहदेव मणिपुष्पक। जिससे हुआ है आतंक। चहूं ओर ॥ १५० ॥ काश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥ वहां भूपति थे अनेक। द्रुपद द्रौपदेयादिक । और काशीपति देख । महाबाहू जो ॥ ५१ ॥ तथा अर्जुनका सुत। सात्यकि अपराजित । धृष्टद्युम्न नृपनाथ । औ' शिखंडी भी ॥ ५२ ॥ विराट आदि नृपबर। हैं जो सेनाके मुख्य वीर । अनेक शंख निरंतर। बजाये उन्होंने ॥ ५३ ॥ स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥ जिसका हुआ महा गर्जन । विकळ शेष-कूर्म महान । धरणी भारसे हो बेभान। लगे खिसकने ॥ ५४ ॥ हुआ जो ब्रह्मांड डांवाडोल। मेरु मंदार हुये चंचल । उछल उठा सागर जल । कैलासपर ॥ ५५ ॥ उलटता क्या पृथ्वीतल। आकाश होगा डांवाडोल । टूटते हैं तारे सकल । ऐसा लगा ॥ ५६ ॥ काशीराज धनुर्धारी शिखंडी भी महारथी । विराट और सेनानी अपराजित सात्यकी ॥ १७ ॥ द्रुपद द्रौपदी पुत्र अजानु अभिमन्युने । फूंके हैं सबने शंख अपने भिन्न भिन्न जो ॥ १८ ॥ उस गर्जनसे टूटा कौरवोंका हृदय ही । भरके भूमि आकाश गरजा जो भयंकर ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी १६

यह सब सृष्टि गयी रे गयी। देवोंको निराधार स्थिति आयी । ऐसी बडी हीगड़बडी हुयी । सत्यलोकमें ॥ ५७ ॥ दिनमें ही रुका भास्कर । जैसे प्रलयका प्रकार । जिससे हुआ हाहाकार । त्रिभुवनमें ॥ ५८ ॥ तब हुआ आदि पुरुष विस्मित । कहता होता क्या अब विश्व-अंत । किया है लोप वह रव अद्भुत । स-संभ्रम ॥ ५९ ॥ इससे हुआ है विश्वका रक्षण । नहीं तो आया था प्रलयका क्षण । शांत हुआ शंख ध्वनि विलक्षण । कृष्णार्जुनका ॥ १६० ॥ यदि हुआ वह गर्जन शांत । फिर भी रहा गूंजत सतत । जिससे रण भूमिमें है हृत । हुआ कौरवदल ॥ ६१ ॥ जैसे गज समूहके अंदर । सिंह करता लीलासे संहार । वैसे टूटे हैं हृदय गव्हर । कौरव दलके ॥ ६२ ॥ जब वे यह गूंजन सुनते । उनके हृदय सब कांपते । वे सब परस्पर हैं कहते । सावधरे सावध ॥ ६३ ॥ अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ॥ २० ॥ सेनाके पराक्रमी वीर । महारथी औ' महाशूर । उन्होंने दिया पुनः धीर । अपनी सेनाको ॥ ६४ ॥ क्षोभसे हुई हैं लड़नेमें सिद्ध । अत्युत्साहसे उछली हो सन्नध्द । सेनाका क्षोभ देख हुआ है विद्ध । लोकत्रय सब ॥ ६५ ॥ बाणोंका वर्षा धनुर्धर । करते हैं जो निरंतर । बरसते हैं जलधर । प्रलय कालके ॥ ६६ ॥ फिर सीधा खडा सारा कुरु सैन्य व्यवस्थित । चलते हैं अभी शस्त्र इतनेमें कपिध्वज ॥ २० ॥ १७ अर्जुनविषादयोग (3)

उल्लसित अर्जुनका सेनाबलोकन- देखकर वह अर्जुन । होकर उल्हसित मन । लगाये उत्सुक नयन । सेनापर ॥ ६७॥ संग्राममें सब सावधान । खडे सर्वत्र कौरव जन । लीलया लिये तीर कमान । पार्थने तब ॥ ६८ ॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापयमेऽच्युत ॥ २१ ॥ पार्थने की कृष्णसे प्रार्थना। प्रभु मेरे रथको हांकना । बीचमें वह खड़ा करना। दोनों दलके ॥ ६९ ॥ यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् कैर्मयासह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥ योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्रसमागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ तब मैं क्षण एक। सब वीर सैनिक । देखूंगा ये अशेष। जो हैं झुंजार ॥ ७० ॥ यहां सभी जो ये आये हैं। मुझे लडना किससे है। मुझको यह देखना है। इसीलिये ॥७१॥ हाथमें धनुष्य लेके बोला कृष्णसे वाक्य ये । अर्जुनने कहा दोनों सेना मध्य देव मेरा रथ खडा कर ॥ २१ ॥ देखूंगा मुझसे कौन करता युद्ध कामना । रण-संग्राममें आज किससे जूझना मुझे ॥ २२ ॥ जुझारू वीर जो सारे देख लेता यहां सभी । यहां उस कुबुद्धिके करना चाहते प्रिय ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी १८

यहां हैं सारे कौरव। आतुर जो दुःखभाव । मारते हैं हाथ पांव। पुरुषार्थ हीन ॥ ७२ ॥ करते हैं ये युध्द कामना। न जाने स्थिरतासे लड़ना। सुनोजी संजयका कहना। अब राजासे ॥ ७३॥ संजय उवाच एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ पार्थका कर शब्द श्रवण। रथको खडा किया तत्क्षण। दोनों दलके बीच समान। श्रीकृष्णने तब ॥ ७४॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ २५ ॥ यहां भीष्म-द्रोणादिक। आत्मीय जन सम्मुख । अन्य नृपति अनेक। खडे हैं जो ॥ ७५॥ यहां स्थिर कर रथ। देखता रहा है पार्थ। सेना समूह समस्त। उमंगसे ॥ ७६ ॥ कहता है देव ! देख देख। हैं ये कुलगुरु अशेष। विस्मय हुआ क्षण एक। सुन श्रीकृष्ण ॥ ७७॥ कृष्ण बोले मनमें अपने। इसके मनका कौन जाने। मनमें सोचा क्या है इसने। अचरज है ॥ ७८ ॥ उसने किया भावी अनुमान। हृदयस्थको है सबका ज्ञान। किंतु रहा उस समय मौन। कुछ न बोल ॥ ७९॥ संजयनें कहा यह अर्जुनका वाक्य सुन श्रीकृष्ण शीघ्र ही। मध्यमें उन सैन्योंके लाया उत्तम जो रथ ॥ २४ ॥ फिर निहारके ठीक भीष्म द्रोणादि जो नृप। कहता है जुटे पार्थ देखो कौरव तू सब ॥ २५ ॥ १९ अर्जुनविषादयोग

तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् । आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥ २६ ॥ श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥ तब वहां पार्थ सकल। पित्र पितामह केवल। गुरुबंधु सखा मातुल। देखने लगा ॥ ८० ॥ इष्ट मित्र आप्त। पुत्रादि समस्त। आये हैं युद्धार्थ। सेनामें सब ॥ ८१ ॥ सुहृदजन श्वशुर। अन्य भी हैं सखा वीर। पुत्र पौत्रादि कुमार। धनुर्धर जो ॥ ८२ ॥ जिन्होने उपकार किये थे। संकटमें जो काम आये थे। श्रेष्ठ कनिष्ठ सभी जन थे। वहां सारे ॥ ८३ ॥ कुल सर्वस्व दोनो दलमें। आया था जो लडने रणमें। देखा सब उस समयमें। पार्थने वहां ॥ ८४ ॥ कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् मनमें वहां गडबड हुयी। सहज भावसे करुणा आयी। अपमानसे वीरवृत्ति गयी। उसको छोड़ ॥ ८५ ॥ होती है जो उत्तम कुलकी। मूर्ति मानो गुण लावण्यकी। वह नहीं रहती अन्याकी। तेजस्वितासे ॥ ८६ ॥ अर्जुनकी करुणा- नवीनाके चावसे है जैसे। कामासक्त हठता पत्नीसे। चसका लगता है भ्रमसे। वैसेही ॥ ८७ ॥ तब अर्जुनने देखा खडे हैं सिद्ध हो कर। दादा चाचा तथा मामा सगे संबंधि औ' सखा ॥ २६ ॥ गुरुबंधु पुत्र पौत्र खडे स्वजन हैं सभी । सबको देख कौंतेय रणमें जो स्वबांधव ॥ २७ ॥ २० ज्ञानेश्वरी

अथवा तपोबलसे ऋध्दि। पाकर भृंश होती है बुध्दि। फिर उसे विरक्ति औ' सिध्दि। भूल जाती ॥ ८८ ॥ ऐसा हुआ वहां अर्जुनका। गया पुरुषत्व जो उसका। दिया दान अन्तःकरणका। करुणाको ॥ ८९ ॥ थर्रानेसे जैसे मंत्रज्ञमें। भूत संचार होता तनमें। वैसे अर्जुन महामोहमें। डूब गया ॥ १९० ॥ जिससे गया उसका धैर्य। द्रवने लगा उसका हिय। द्रवता जैसा चांदनीमें काय। सोमकांतका ॥ ९१ ॥ वैसा ही है वह पार्थ। अतिस्नेहसे मोहित। कहता सखेद बात। अच्युतसे ॥ ९२ ॥ अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गांडीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥ कहता वह सुनो कृष्ण। यहां गोत्र वर्ण संपूर्ण। करने आया है जो रण। देखता मैं ॥ ९३ ॥ अत्यंत करुणाग्रस्त शोकसे बोलने लगा। अर्जुनने कहा कृष्ण स्वजन हैं सारे रणमें देख उत्सुक ॥ २८ ॥ होते शिथिल हैं गात्र वैसे ही मुख सूखता। शरीर कांपता सारा रोम रोम हुये खडे ॥ २९ ॥ छोड़ता हाथ गांडीव जलती है सभी त्वचा। असह्य है खड़ा होना मन ही भ्रमता सब ॥ ३० ॥ २१ अर्जुनविषादयोग