ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह सब सृष्टि गयी रे गयी। देवोंको निराधार स्थिति आयी । ऐसी बडी हीगड़बडी हुयी । सत्यलोकमें ॥ ५७ ॥ दिनमें ही रुका भास्कर । जैसे प्रलयका प्रकार । जिससे हुआ हाहाकार । त्रिभुवनमें ॥ ५८ ॥ तब हुआ आदि पुरुष विस्मित । कहता होता क्या अब विश्व-अंत । किया है लोप वह रव अद्भुत । स-संभ्रम ॥ ५९ ॥ इससे हुआ है विश्वका रक्षण । नहीं तो आया था प्रलयका क्षण । शांत हुआ शंख ध्वनि विलक्षण । कृष्णार्जुनका ॥ १६० ॥ यदि हुआ वह गर्जन शांत । फिर भी रहा गूंजत सतत । जिससे रण भूमिमें है हृत । हुआ कौरवदल ॥ ६१ ॥ जैसे गज समूहके अंदर । सिंह करता लीलासे संहार । वैसे टूटे हैं हृदय गव्हर । कौरव दलके ॥ ६२ ॥ जब वे यह गूंजन सुनते । उनके हृदय सब कांपते । वे सब परस्पर हैं कहते । सावधरे सावध ॥ ६३ ॥ अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ॥ २० ॥ सेनाके पराक्रमी वीर । महारथी औ' महाशूर । उन्होंने दिया पुनः धीर । अपनी सेनाको ॥ ६४ ॥ क्षोभसे हुई हैं लड़नेमें सिद्ध । अत्युत्साहसे उछली हो सन्नध्द । सेनाका क्षोभ देख हुआ है विद्ध । लोकत्रय सब ॥ ६५ ॥ बाणोंका वर्षा धनुर्धर । करते हैं जो निरंतर । बरसते हैं जलधर । प्रलय कालके ॥ ६६ ॥ फिर सीधा खडा सारा कुरु सैन्य व्यवस्थित । चलते हैं अभी शस्त्र इतनेमें कपिध्वज ॥ २० ॥ १७ अर्जुनविषादयोग (3)