ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथा नकुलने सुघोष। सहदेव मणिपुष्पक। जिससे हुआ है आतंक। चहूं ओर ॥ १५० ॥ काश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥ वहां भूपति थे अनेक। द्रुपद द्रौपदेयादिक । और काशीपति देख । महाबाहू जो ॥ ५१ ॥ तथा अर्जुनका सुत। सात्यकि अपराजित । धृष्टद्युम्न नृपनाथ । औ' शिखंडी भी ॥ ५२ ॥ विराट आदि नृपबर। हैं जो सेनाके मुख्य वीर । अनेक शंख निरंतर। बजाये उन्होंने ॥ ५३ ॥ स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥ जिसका हुआ महा गर्जन । विकळ शेष-कूर्म महान । धरणी भारसे हो बेभान। लगे खिसकने ॥ ५४ ॥ हुआ जो ब्रह्मांड डांवाडोल। मेरु मंदार हुये चंचल । उछल उठा सागर जल । कैलासपर ॥ ५५ ॥ उलटता क्या पृथ्वीतल। आकाश होगा डांवाडोल । टूटते हैं तारे सकल । ऐसा लगा ॥ ५६ ॥ काशीराज धनुर्धारी शिखंडी भी महारथी । विराट और सेनानी अपराजित सात्यकी ॥ १७ ॥ द्रुपद द्रौपदी पुत्र अजानु अभिमन्युने । फूंके हैं सबने शंख अपने भिन्न भिन्न जो ॥ १८ ॥ उस गर्जनसे टूटा कौरवोंका हृदय ही । भरके भूमि आकाश गरजा जो भयंकर ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी १६