ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउल्लसित अर्जुनका सेनाबलोकन- देखकर वह अर्जुन । होकर उल्हसित मन । लगाये उत्सुक नयन । सेनापर ॥ ६७॥ संग्राममें सब सावधान । खडे सर्वत्र कौरव जन । लीलया लिये तीर कमान । पार्थने तब ॥ ६८ ॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापयमेऽच्युत ॥ २१ ॥ पार्थने की कृष्णसे प्रार्थना। प्रभु मेरे रथको हांकना । बीचमें वह खड़ा करना। दोनों दलके ॥ ६९ ॥ यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् कैर्मयासह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥ योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्रसमागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ तब मैं क्षण एक। सब वीर सैनिक । देखूंगा ये अशेष। जो हैं झुंजार ॥ ७० ॥ यहां सभी जो ये आये हैं। मुझे लडना किससे है। मुझको यह देखना है। इसीलिये ॥७१॥ हाथमें धनुष्य लेके बोला कृष्णसे वाक्य ये । अर्जुनने कहा दोनों सेना मध्य देव मेरा रथ खडा कर ॥ २१ ॥ देखूंगा मुझसे कौन करता युद्ध कामना । रण-संग्राममें आज किससे जूझना मुझे ॥ २२ ॥ जुझारू वीर जो सारे देख लेता यहां सभी । यहां उस कुबुद्धिके करना चाहते प्रिय ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी १८