भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यहां हैं सारे कौरव। आतुर जो दुःखभाव । मारते हैं हाथ पांव। पुरुषार्थ हीन ॥ ७२ ॥ करते हैं ये युध्द कामना। न जाने स्थिरतासे लड़ना। सुनोजी संजयका कहना। अब राजासे ॥ ७३॥ संजय उवाच एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ पार्थका कर शब्द श्रवण। रथको खडा किया तत्क्षण। दोनों दलके बीच समान। श्रीकृष्णने तब ॥ ७४॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ २५ ॥ यहां भीष्म-द्रोणादिक। आत्मीय जन सम्मुख । अन्य नृपति अनेक। खडे हैं जो ॥ ७५॥ यहां स्थिर कर रथ। देखता रहा है पार्थ। सेना समूह समस्त। उमंगसे ॥ ७६ ॥ कहता है देव ! देख देख। हैं ये कुलगुरु अशेष। विस्मय हुआ क्षण एक। सुन श्रीकृष्ण ॥ ७७॥ कृष्ण बोले मनमें अपने। इसके मनका कौन जाने। मनमें सोचा क्या है इसने। अचरज है ॥ ७८ ॥ उसने किया भावी अनुमान। हृदयस्थको है सबका ज्ञान। किंतु रहा उस समय मौन। कुछ न बोल ॥ ७९॥ संजयनें कहा यह अर्जुनका वाक्य सुन श्रीकृष्ण शीघ्र ही। मध्यमें उन सैन्योंके लाया उत्तम जो रथ ॥ २४ ॥ फिर निहारके ठीक भीष्म द्रोणादि जो नृप। कहता है जुटे पार्थ देखो कौरव तू सब ॥ २५ ॥ १९ अर्जुनविषादयोग

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