भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् । आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥ २६ ॥ श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥ तब वहां पार्थ सकल। पित्र पितामह केवल। गुरुबंधु सखा मातुल। देखने लगा ॥ ८० ॥ इष्ट मित्र आप्त। पुत्रादि समस्त। आये हैं युद्धार्थ। सेनामें सब ॥ ८१ ॥ सुहृदजन श्वशुर। अन्य भी हैं सखा वीर। पुत्र पौत्रादि कुमार। धनुर्धर जो ॥ ८२ ॥ जिन्होने उपकार किये थे। संकटमें जो काम आये थे। श्रेष्ठ कनिष्ठ सभी जन थे। वहां सारे ॥ ८३ ॥ कुल सर्वस्व दोनो दलमें। आया था जो लडने रणमें। देखा सब उस समयमें। पार्थने वहां ॥ ८४ ॥ कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् मनमें वहां गडबड हुयी। सहज भावसे करुणा आयी। अपमानसे वीरवृत्ति गयी। उसको छोड़ ॥ ८५ ॥ होती है जो उत्तम कुलकी। मूर्ति मानो गुण लावण्यकी। वह नहीं रहती अन्याकी। तेजस्वितासे ॥ ८६ ॥ अर्जुनकी करुणा- नवीनाके चावसे है जैसे। कामासक्त हठता पत्नीसे। चसका लगता है भ्रमसे। वैसेही ॥ ८७ ॥ तब अर्जुनने देखा खडे हैं सिद्ध हो कर। दादा चाचा तथा मामा सगे संबंधि औ' सखा ॥ २६ ॥ गुरुबंधु पुत्र पौत्र खडे स्वजन हैं सभी । सबको देख कौंतेय रणमें जो स्वबांधव ॥ २७ ॥ २० ज्ञानेश्वरी