ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथवा तपोबलसे ऋध्दि। पाकर भृंश होती है बुध्दि। फिर उसे विरक्ति औ' सिध्दि। भूल जाती ॥ ८८ ॥ ऐसा हुआ वहां अर्जुनका। गया पुरुषत्व जो उसका। दिया दान अन्तःकरणका। करुणाको ॥ ८९ ॥ थर्रानेसे जैसे मंत्रज्ञमें। भूत संचार होता तनमें। वैसे अर्जुन महामोहमें। डूब गया ॥ १९० ॥ जिससे गया उसका धैर्य। द्रवने लगा उसका हिय। द्रवता जैसा चांदनीमें काय। सोमकांतका ॥ ९१ ॥ वैसा ही है वह पार्थ। अतिस्नेहसे मोहित। कहता सखेद बात। अच्युतसे ॥ ९२ ॥ अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गांडीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥ कहता वह सुनो कृष्ण। यहां गोत्र वर्ण संपूर्ण। करने आया है जो रण। देखता मैं ॥ ९३ ॥ अत्यंत करुणाग्रस्त शोकसे बोलने लगा। अर्जुनने कहा कृष्ण स्वजन हैं सारे रणमें देख उत्सुक ॥ २८ ॥ होते शिथिल हैं गात्र वैसे ही मुख सूखता। शरीर कांपता सारा रोम रोम हुये खडे ॥ २९ ॥ छोड़ता हाथ गांडीव जलती है सभी त्वचा। असह्य है खड़ा होना मन ही भ्रमता सब ॥ ३० ॥ २१ अर्जुनविषादयोग