ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरणमें ये अति उद्यत । लड़ने आये हैं समस्त । किन्तु हमें यह उचित । होगा क्या ॥ ९४ ॥ इस लड़ाईके विचारसे । कसमसाता तन मनसे । अस्थिर हूं मन औ' बुद्धिसे । इस क्षणमें ॥ ९५ ॥ देखो कांपता है तन । शुष्क हुवा है वदन । शिथिल सारे करण । हुये मेरे ॥ ९६ ॥ मन मेरा अति व्यग्र । खडे हैं सारे रोमाग्र । गळ गांडीव समग्र । हाथ हैं लूले ॥ ९७ ॥ न पकडते वह खिसका । न जानते छूटा है हाथका । हृदय हुवा महा-मोहका । घर ही मानो ॥ ९८ ॥ वज्रसे वह कठिन । दुर्धर अति दारुण । उससे असाधारण । यह स्नेह ॥ ९९ ॥ जीता जिसने रणमें शिवको । मिटाया है निवात कवचको । स्नेहने लपेटा उसी पार्थको । क्षणभरमें यहां ॥ २०० ॥ भेदता रहता भ्रमर जैसे । अति कठिन काष्ठ भी लीलासे । फंसता कमल-कलिमें जैसे । अति कोमल ॥ १ ॥ वहां प्राण भी निकल जायेगा । किन्तु न कमल चीरा जायेगा । कोमलपन ही कठिन होगा । स्नेहका ऐसा ॥ २ ॥ यह है आदि पुरुषकी माया । ब्रह्मा भी इसे समझ न पाया । तभी झुलाया अर्जुनको राया । कहता है संजय ॥ ३ ॥ सुनो फिर वह अर्जुन । देख कर सारे स्वजन । भूल गया है अभिमान । युद्धका जो ॥ ४ ॥ न जाने कैसी करुणा । स्पर्शी है अन्तःकरणा । तब कहे वह कृष्ण । चलो यहांसे ॥ ५ ॥ मन मेरा अति व्याकुल । कांपता है तन सकल । वाचा होती है अनर्गल । इससे मेरी ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी २२