ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
उल्लसित अर्जुनका सेनाबलोकन- देखकर वह अर्जुन । होकर उल्हसित मन । लगाये उत्सुक नयन । सेनापर ॥ ६७॥ संग्राममें सब सावधान । खडे सर्वत्र कौरव जन । लीलया लिये तीर कमान । पार्थने तब ॥ ६८ ॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापयमेऽच्युत ॥ २१ ॥ पार्थने की कृष्णसे प्रार्थना। प्रभु मेरे रथको हांकना । बीचमें वह खड़ा करना। दोनों दलके ॥ ६९ ॥ यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् कैर्मयासह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥ योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्रसमागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ तब मैं क्षण एक। सब वीर सैनिक । देखूंगा ये अशेष। जो हैं झुंजार ॥ ७० ॥ यहां सभी जो ये आये हैं। मुझे लडना किससे है। मुझको यह देखना है। इसीलिये ॥७१॥ हाथमें धनुष्य लेके बोला कृष्णसे वाक्य ये । अर्जुनने कहा दोनों सेना मध्य देव मेरा रथ खडा कर ॥ २१ ॥ देखूंगा मुझसे कौन करता युद्ध कामना । रण-संग्राममें आज किससे जूझना मुझे ॥ २२ ॥ जुझारू वीर जो सारे देख लेता यहां सभी । यहां उस कुबुद्धिके करना चाहते प्रिय ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी १८
यहां हैं सारे कौरव। आतुर जो दुःखभाव । मारते हैं हाथ पांव। पुरुषार्थ हीन ॥ ७२ ॥ करते हैं ये युध्द कामना। न जाने स्थिरतासे लड़ना। सुनोजी संजयका कहना। अब राजासे ॥ ७३॥ संजय उवाच एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ पार्थका कर शब्द श्रवण। रथको खडा किया तत्क्षण। दोनों दलके बीच समान। श्रीकृष्णने तब ॥ ७४॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ २५ ॥ यहां भीष्म-द्रोणादिक। आत्मीय जन सम्मुख । अन्य नृपति अनेक। खडे हैं जो ॥ ७५॥ यहां स्थिर कर रथ। देखता रहा है पार्थ। सेना समूह समस्त। उमंगसे ॥ ७६ ॥ कहता है देव ! देख देख। हैं ये कुलगुरु अशेष। विस्मय हुआ क्षण एक। सुन श्रीकृष्ण ॥ ७७॥ कृष्ण बोले मनमें अपने। इसके मनका कौन जाने। मनमें सोचा क्या है इसने। अचरज है ॥ ७८ ॥ उसने किया भावी अनुमान। हृदयस्थको है सबका ज्ञान। किंतु रहा उस समय मौन। कुछ न बोल ॥ ७९॥ संजयनें कहा यह अर्जुनका वाक्य सुन श्रीकृष्ण शीघ्र ही। मध्यमें उन सैन्योंके लाया उत्तम जो रथ ॥ २४ ॥ फिर निहारके ठीक भीष्म द्रोणादि जो नृप। कहता है जुटे पार्थ देखो कौरव तू सब ॥ २५ ॥ १९ अर्जुनविषादयोग
तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् । आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥ २६ ॥ श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥ तब वहां पार्थ सकल। पित्र पितामह केवल। गुरुबंधु सखा मातुल। देखने लगा ॥ ८० ॥ इष्ट मित्र आप्त। पुत्रादि समस्त। आये हैं युद्धार्थ। सेनामें सब ॥ ८१ ॥ सुहृदजन श्वशुर। अन्य भी हैं सखा वीर। पुत्र पौत्रादि कुमार। धनुर्धर जो ॥ ८२ ॥ जिन्होने उपकार किये थे। संकटमें जो काम आये थे। श्रेष्ठ कनिष्ठ सभी जन थे। वहां सारे ॥ ८३ ॥ कुल सर्वस्व दोनो दलमें। आया था जो लडने रणमें। देखा सब उस समयमें। पार्थने वहां ॥ ८४ ॥ कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् मनमें वहां गडबड हुयी। सहज भावसे करुणा आयी। अपमानसे वीरवृत्ति गयी। उसको छोड़ ॥ ८५ ॥ होती है जो उत्तम कुलकी। मूर्ति मानो गुण लावण्यकी। वह नहीं रहती अन्याकी। तेजस्वितासे ॥ ८६ ॥ अर्जुनकी करुणा- नवीनाके चावसे है जैसे। कामासक्त हठता पत्नीसे। चसका लगता है भ्रमसे। वैसेही ॥ ८७ ॥ तब अर्जुनने देखा खडे हैं सिद्ध हो कर। दादा चाचा तथा मामा सगे संबंधि औ' सखा ॥ २६ ॥ गुरुबंधु पुत्र पौत्र खडे स्वजन हैं सभी । सबको देख कौंतेय रणमें जो स्वबांधव ॥ २७ ॥ २० ज्ञानेश्वरी
अथवा तपोबलसे ऋध्दि। पाकर भृंश होती है बुध्दि। फिर उसे विरक्ति औ' सिध्दि। भूल जाती ॥ ८८ ॥ ऐसा हुआ वहां अर्जुनका। गया पुरुषत्व जो उसका। दिया दान अन्तःकरणका। करुणाको ॥ ८९ ॥ थर्रानेसे जैसे मंत्रज्ञमें। भूत संचार होता तनमें। वैसे अर्जुन महामोहमें। डूब गया ॥ १९० ॥ जिससे गया उसका धैर्य। द्रवने लगा उसका हिय। द्रवता जैसा चांदनीमें काय। सोमकांतका ॥ ९१ ॥ वैसा ही है वह पार्थ। अतिस्नेहसे मोहित। कहता सखेद बात। अच्युतसे ॥ ९२ ॥ अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गांडीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥ कहता वह सुनो कृष्ण। यहां गोत्र वर्ण संपूर्ण। करने आया है जो रण। देखता मैं ॥ ९३ ॥ अत्यंत करुणाग्रस्त शोकसे बोलने लगा। अर्जुनने कहा कृष्ण स्वजन हैं सारे रणमें देख उत्सुक ॥ २८ ॥ होते शिथिल हैं गात्र वैसे ही मुख सूखता। शरीर कांपता सारा रोम रोम हुये खडे ॥ २९ ॥ छोड़ता हाथ गांडीव जलती है सभी त्वचा। असह्य है खड़ा होना मन ही भ्रमता सब ॥ ३० ॥ २१ अर्जुनविषादयोग
रणमें ये अति उद्यत । लड़ने आये हैं समस्त । किन्तु हमें यह उचित । होगा क्या ॥ ९४ ॥ इस लड़ाईके विचारसे । कसमसाता तन मनसे । अस्थिर हूं मन औ' बुद्धिसे । इस क्षणमें ॥ ९५ ॥ देखो कांपता है तन । शुष्क हुवा है वदन । शिथिल सारे करण । हुये मेरे ॥ ९६ ॥ मन मेरा अति व्यग्र । खडे हैं सारे रोमाग्र । गळ गांडीव समग्र । हाथ हैं लूले ॥ ९७ ॥ न पकडते वह खिसका । न जानते छूटा है हाथका । हृदय हुवा महा-मोहका । घर ही मानो ॥ ९८ ॥ वज्रसे वह कठिन । दुर्धर अति दारुण । उससे असाधारण । यह स्नेह ॥ ९९ ॥ जीता जिसने रणमें शिवको । मिटाया है निवात कवचको । स्नेहने लपेटा उसी पार्थको । क्षणभरमें यहां ॥ २०० ॥ भेदता रहता भ्रमर जैसे । अति कठिन काष्ठ भी लीलासे । फंसता कमल-कलिमें जैसे । अति कोमल ॥ १ ॥ वहां प्राण भी निकल जायेगा । किन्तु न कमल चीरा जायेगा । कोमलपन ही कठिन होगा । स्नेहका ऐसा ॥ २ ॥ यह है आदि पुरुषकी माया । ब्रह्मा भी इसे समझ न पाया । तभी झुलाया अर्जुनको राया । कहता है संजय ॥ ३ ॥ सुनो फिर वह अर्जुन । देख कर सारे स्वजन । भूल गया है अभिमान । युद्धका जो ॥ ४ ॥ न जाने कैसी करुणा । स्पर्शी है अन्तःकरणा । तब कहे वह कृष्ण । चलो यहांसे ॥ ५ ॥ मन मेरा अति व्याकुल । कांपता है तन सकल । वाचा होती है अनर्गल । इससे मेरी ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी २२
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥ युद्ध परांग्मुखता वध्य हैं यदि कौरवादिक । क्यों न बंधु युधिष्ठिरादिक । सभी हैं एकसे सगोत्रिक । एकत्र यहां ॥ ७ ॥ ल्गाता तभी मिटा दो रण । नहीं करता है मेरा मन । यह है सब मूल कारण । महापापका ॥ ८ ॥ देव ! कैसे ही देखने पर । लड़ना है बुराईका घर । न लड़ें यदि हम आखिर । भला है सबका ॥ ९ ॥ न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥ न चाहूंगा विजय वृत्ति । न चाहूंगा राज्य औ' कीर्ति । उससे क्या मिलेगी शांति । कह तू यह ॥ २१० ॥ येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥ मार कर इन सबको । भोगना है जिन भोगोंको । जलने दे उन सबको । कहता अर्जुन ॥ ११ ॥ आने दो कैसी ही स्थिति । सहेंगे विषम विपत्ति । बुझें न क्यों जीवन-ज्योति । उस पर भी ॥ १२ ॥ कृष्ण मैं देखता सारे सभी अशुभ लक्षण । कोयी न दीखता श्रेय यहां स्वजन घातसे ॥ ३१ ॥ न चाहूं जय औ' राज्य वैसे ही सुख भोग भी । राज्यमें या भोगमें क्या है जीनेमें भी धरा यहां ॥ ३२ ॥ जिनके हित है सारा राज्य भोग सुखादि जो । वेही युद्धार्थ हैं सिद्ध धन प्राणादि त्याग के ॥ ३३ ॥ २३ अर्जुनविषादयोग
अपनोंका घात करना। फिर राज्य-सुख भोगना। मेरा यह सोच सकना। स्वप्नमें भी असंभव ॥ १३ ॥ गुरु जनोंका अहित करना। तो किसके लिये है जनमना। तथा किसके लिये कह जीना। शत्रुबुद्धिसे ॥ १४ ॥ पुत्रको चाहता है कुल। उसका क्या यही है फल। गोत्र-जन वध केवल। करना है क्या ॥ १५ ॥ वज्र सम है यह कठोर। कैसा करे इसका उच्चार। हमें करना मंगल कर। यथा संभव ॥ १६ ॥ हमको है जो जो करना। इन्ही सबको है भोगना। प्राण निछावर करना। इनके हित ॥ १७ ॥ बनकर विश्वके भूपाल। जीत करके विश्व सकल। रखना है अपना ही कुल। संतुष्ट सदा ॥ १८ ॥ वही है यहां समस्त। कैसा कर्म विपरीत। हुए वे सब उद्यत। युध्द करने ॥ १९ ॥ त्यज कर ये परिवार। वैसे ही गृह औ' भांडार। शस्त्रांपे रख तैयार। हुए हैं प्राण ॥ २० ॥ ऐसोंको मैं कैसे मारूं। किन पर शस्त्र धरूं। अपने हियका करूं। घात कैसा ॥ २१ ॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥ तू न जानता क्या ये हैं कौन। सम्मुख खडे हैं भीष्म द्रोण। इनके उपकार महान। हैं हमपर ॥ २२ ॥ वैसे साले श्वशुर मातुल। तथा अन्य बंधु हैं सकल। पुत्र पौत्र हैं अति केवल। आप्त जन सारे ॥ २३ ॥ दादा बाबा पुत्र पौत्र अपने दीखते यहां। गुरु औ' ससुरा साला सगे स्वजन हैं सभी ॥ २३४ ॥ ज्ञानेश्वरी २४
सुनो हैं ये अतीव निकट के । आप्त जन सब परिवारके । इन्हें कटु बोलें तभी पापके । भागी हैं हम ॥ २४ ॥ एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥ चाहे सो इन्हें करने दो । हमको अभी मारने दो । किंतु मनमें न लाने दो । इनका अहित ॥ २५ ॥ मिले यदि विश्व साम्राज्य । तब भी हमें यह वर्ज्य । कार्य अनुचित जो त्याज्य । नहीं करूंगा ॥ २६ ॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाऽऽश्रयेदस्मान् हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥ यदि आज हम ऐसा करेंगे । कौन हमारा आदर करेंगे । तेरा दर्शन भी कैसा करेंगे । कह श्रीकृष्ण ॥ २७ ॥ वध करनेसे गोत्र जनोंका । घर बनके महा-पापका । खोऊंगा मैं तुझको हाथका । जो है अपना ॥ २८ ॥ कुल नाशके पापसे । पूर्णता डूब जानेसे । देखूंगा मैं तुझे कैसे । इस भांति ॥ २९ ॥ जैसे उद्यानमें अनल । लगा देख अति प्रबल । क्षण भी न रहे कोयल । स्थिर वैसे ॥ २३० ॥ स-कर्दम सरोवर । देख करके चकोर । करे उसका अव्हेर । वैसा ही तू ॥ ३१ ॥ अजी ओ मेरे देवराय ! । मिटनेसे पुण्य-संचय । छोड़कर होग अदृश्य । हमसे तब ॥ ३२ ॥ इन्हें न मारना चाहूँ यदि ये मारते मुझे । विश्व-साम्राज्य छोड़ूंगा पृथ्वीकी बात क्या भला ॥ ३५ ॥ घातसे कौरवोंका है क्या होगा अपना हित । भले ये आततायी हैं इनका घात पाप है ॥ ३६ ॥ २५ अर्जुनविषादयोग (4)
तस्मान् नार्हा वयं हंतुं धार्तराष्ट्रान् स्वबांधवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनःस्याम माधव ॥ ३७॥ इसीसे म यह नहीं करूंगा । रणमें शस्त्र नहीं उठाऊंगा । क्यों कि मुझे यह युध्द प्रसंग । दीखता निंद्य ॥ ३३ ॥ तुझसे ही जब वियोग होगा । भला तब हमारा क्या रहेगा । उस दुखसे हृदय फटेगा । तेरे बिन श्रीकृष्ण ॥ ३४ ॥ तब कौरव वध होगा । हमें राज्य-भोग मिलेगा । यह सारा अशक्य होगा । कहता है पार्थ ॥ ३५ ॥ यद्यप्येते न पश्यंति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापद्स्मान् निवर्तितुम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥ अभिमान मदसे भूलकर । यदि आये ये रणभूमिपर । केसा होगा यहां मंगलकर । यह देखना होगा ॥ ३६ ॥ ऐसा कैसा यह करना । अपनोंको आप मारना । जानबूझकर है लेना । विष कालकूट ॥ ३७ ॥ अजी कभी राह चलते । यदि कहींसे सिंह आते । उसको टालकर जाते । इसीमें भला है ॥ ३८ ॥ तथैव घात बंधूका हमें योग्य नहीं कभी । घातसे स्वजनोंके क्या जीयेंगे सुखसे हम ॥ ३७ ॥ लोभसे नष्ट है बुद्धि जिससे ये न जानते । कुलके क्षयका पाप तथा क्या मित्र-द्रोहका ॥ ३८ ॥ पापसे बचना ऐसे न सोचें क्या भला हम । कुलक्षय महा-दोष दीखता स्पष्ट ही यहां ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी २६
प्राप्त प्रकाशको छोड़ना । अंधकूपमें फिर जाना । उससे है क्या लाभ होना । कहो देव ॥ ३९ ॥ आगको सम्मुख देख कर । गये न उसको लाघकर । क्षणमें वह लपटेकर । जला देगा ॥ ४० ॥ वैसे दोष असाधारण । घेरते हैं हमको पूर्ण । जानकर भी आचरण । करना कैसे ॥ ४१ ॥ पूछ कर इतना बोले पार्थ । सुनो देव इसका मतितार्थ । कहूंगा इस पापका अनर्थ । अब तुझसे ही ॥ ४२ ॥ कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥ जेसे लकडीका घर्षण । उपजाता अग्नि महान । उससे जल जाता इंधन । प्रज्वल होके ॥ ४३ ॥ कुलमें वैसे परस्पर । वध किया तो स-मत्सर । उससे महादोष घोर । कुलघातका होगा ॥ ४४ ॥ अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः । स्त्रीषुदुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥ इससे है ऐसा पाप । करें कुल-धर्म लोप । बढ़ता अधर्म व्याप । कुलमें ही ॥ ४५ ॥ इससे सारासार विचार । किसके कैसे क्या है आचार । मिट जाते हैं मूल आधार । विधि-निषेधके ॥ ४६ ॥ कुलके क्षयसे नाश कुल-धर्म सनातन । अधर्म फैलता सारा कुलके धर्म-नाशसे ॥ ४० ॥ अधर्म फैल जानेसे भ्रष्ट होती कुल-स्त्रियां । स्त्रियोंके भ्रष्ट होनेसे होता है वर्ण-संकर ॥ ४१ ॥ २७ अर्जुनविषादयोग
बुझाकर हाथका दीप । तममें चलनेसे आप । टकराये अपने आप । स्वाभाविक ॥ ४७ ॥ वैसा कुलक्षय जब होता । कुलमें आद्य-धर्म मिटता । कहो तब वहां क्या होता । पापके बिन ॥ ४८ ॥ छूटते हैं तब यम औ' नियम । टूटता मन-इंद्रियोंका संयम । घडता है व्यभिचारका कुकर्म । कुलस्त्रियोंसे ॥ ४९ ॥ उत्तममें अधमका संस्कार होता । इस भांति वर्ण अवर्णमें घुलता । तब है मूल सहित उखड जाता । संस्कृति धर्म ॥ ५० ॥ जैसे चौराहेके बलि पर । उडते हैं काग चहूं ओर । वैसे हैं दोष घुसते घोर । सत्कुलोंमें ॥ ५१ ॥ संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतंति पितरो ह्येषां लुप्त पिंडोदक क्रियाः ॥ ४२ ॥ फिर उस पूर्ण कुलको । तथा उस कुलघातिको । नरक मिला दोनोंको । इसको जान ॥ ५२ ॥ वंश विस्तार ही समस्त । होता जाता है जो पतित । गिरते पूर्वज स्वर्गस्थ । इससे सभी ॥ ५३ ॥ लोप होते जहां नित्य-कर्म । फिर कैसे नैमित्तिक धर्म । कहां रहे तब श्राध्द कर्म । किसके लिये ॥ ५४ ॥ नखाग्रमें डसनेसे साप । शिखाग्रतक विषका व्याप । वैसे आब्रह्म डूबता आप । समूचा कुल ॥ ५५ ॥ दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥ इससे नर्कमें जाता कुलघ्नों सह है कुल । पितरोंका अधःपात होता है श्राद्ध लोपसे ॥ ४२ ॥ दोषसे है कुलघ्नोंके होता है वर्ण-संकर । डूबते जातिके धर्म कुल धर्म सनातन ॥ ४३ ॥ ज्ञानेश्वरी २८
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुमः ॥ ४४ । अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हंतुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥ सुन प्रभुजी वचन एक । यहां घडता महापातक । जिस संग दोषसे लौकिक । पाता है भ्रांति ॥ ५६ ॥ जैसे है अपने घरको । लगी आग सब गांवको । निगलती है सर्वस्वको । जला करके ॥ ५७ ॥ वैसे ही उस कुल संगतिसे । दूसरे जनके बरतनेसे । उनके ऐसे हीन संसर्गसे । फैलते हैं दोष ॥ ५८ ॥ ऐसे नाना दोषोंका सकल । भांडार होता है ऐसा कुल । कहता पार्थ उसे केवल । नरक भोग घोर ॥ ५९ ॥ उस स्थानमें हुआ पतन । न होता कल्पांतमें उत्थान । कुलक्षयका पाप महान । अर्जुन कहता ॥ ६० ॥ अजी सुनके यह कानसे । घिन नहीं की तूने चितसे । कठोर किया हिय वज्र-से । कृष्ण तूने ॥ ६१ ॥ अपेक्षा है क्यों राज्य औ' सुख । जिसके लिये वह क्षणिक । जानकर भी यह ये दोष । नहीं त्यजना क्या ? ॥ ६२ ॥ आये यहां अपने कुलके श्रेष्ठ । हमने देखा शत्रु दृष्टिसे भृष्ट । नहीं क्या यह महादोष अनिष्ट । किया हमने ॥ ६३ ॥
जिनके कुलके धर्म डूबते उनको नित । होता नरकमें वास सुनते हैं यही हम ॥ ४४ ॥ कैसा यह महापाप करने जा रहे हम । मारना स्वजनोंको भी राज्यके सुख लोभसे ॥ ४५ ॥
२९ अर्जुनविषादयोग
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥ इस पर भी क्या है जीना । उससे भला चुप होना । शस्त्र छोडकर सहना । इनके तीर ॥ ६५ ॥ इससे जो कुछ होगा । मरनेमें भला होगा । यह पाप नहीं होगा । कभी मुझसे ॥ ६६ ॥ ऐसा देखकर सकल । अर्जुनने अपना कुल । कहा तब राज्य केवल । है नरकवास ॥ ६७ ॥ संजय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥ ४७ ॥ उस समयमें ऐसे । अर्जुन बोला कृष्णसे । संजय कहे राजासे । सुनियेजी ॥ ६८ ॥ अति उद्वेगसे ऐसे फिर । खिन्न मन गद्गद होकर । कूद कर आया पृथ्वी पर । रथसे वह ॥ ६९ ॥ राज कुंवर ऐसा पदच्युत । होकर के सर्वथा उपरत । या जैसे रवि हो राहुग्रस्त । हुआ हतप्रभ ॥ २७० ॥ अथवा महासिद्धिके भ्रममें । तापस उलझा मोहजालमें । तथा फंस कामना भंवरमें । हुआ है दीन ॥ ७१ ॥ इससे तजके शस्त्र रहना शांत होकर । मारेंगे फिर शस्त्रोंसे रणमें मुझे कौरव ॥ ४६ ॥ संजयने कहा रणमें कहके ऐसा शोकाकुल धनंजय । डाल कर सभी शस्त्र रथमें बैठ ही गया ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०
तैसा वह धनुर्धर । दुःखावेगसे जर्जर । रथको था जो सुंदर । दिया छोड ॥ ७२ ॥ तथा छोड तीर कमान । करते अश्रुपात नयन । राजन् सुनो यह कथन । बोला संजय ॥ ७३ ॥ दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना — इस पर वैकुंठ नाथ । देखके खेद-मूर्ती पार्थ । किस भांतिका परमार्थ । कहेगा भला ॥ ७४ ॥ सविस्तर करेगा वर्णन । सकौतुक कहेगा कथन । कहेगा ज्ञानदेव वचन । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥ गीता श्लोक ४७ ज्ञानेश्वरी ओवी २४७. ॐ
२ सांख्य योग संजय उवाच तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥ अर्जुनकी मनोदशा संजयने कहा राजासे । पार्थने साश्रु नयनसे । अति शोकाकुल होनेसे । किया रुदन ॥ १ ॥ स्वकुल देखकर समस्त । स्नेह उपजा अत्यद्भुत । उससे द्रवित हुवा चित्त । इस प्रकार ॥ २ ॥ जलमें घुलता जैसे नून । अथवा हिलता वातसे घन । ऐसे वह दृढ अन्तःकरण । हुवा द्रवित ॥ ३ ॥ मोहाधीन होनेसे वह ऐसा । दिखाया जैसा मुरझाया-सा । कीचमें फंसा हुआ-सा जैसा । राजहंस ॥ ४ ॥ इस भांति वह पांडुकुमार । महामोहमें हो अति जर्जर । खड़ा देख उसे श्रीशार्ंगधर । बोले ऐसा ॥ ५ ॥ संजयने कहा ऐसा जो करुणाग्रस्त अधीर अश्रु-पूरित । करता था जभी शोक उससे कृष्णने कहा ॥ १ ॥
भगवान उवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥ कृष्णका उपदेश— कहे हरि सोचलो तुम अर्जुन । शोक करने योग्य क्या यह स्थान । तूं कौन है क्यों आया है यह जान । औ' करता क्या है ? ॥ ६ ॥ तुझे हुआ क्या है ? । क्या न्यून आया है ? । औ' करना क्या है ? । खेद क्यों ? ॥ ७ ॥ कभी न सोचना तू असंगत । न छोड़ना कभी धैर्य उदात्त । भागे तुझसे अ-यशकी बात । कोसों दूर ॥ ८ ॥ तू है शौर्य-वृत्तिका स्थान । क्षत्रियोंमें अति महान । तेरी कीर्ति-कथाका गान । त्रिभुवनमें ॥ ९ ॥ तूने जीता रणमें शिवको । मिटाया निवात कवचोंको । तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ १० ॥ देखनेसे यह तेरे सम्मुख । दीखते हैं बौने ये तीनों लोक । ऐसा है पौरुषका लौकिक । अर्जुन तेरे ॥ ११ ॥ ऐसा तू इस स्थान पर । वीर-वृत्तिको छोड़कर । दीन-सा अधोमुख होकर । रोता रहा है ॥ १२ ॥ कैसे विषम वेलामें सूझा पाप यह तुझे । न सोहता बड़ोंको जो देता दुष्कीर्ति दुर्गति ॥ २ ॥ न हो निर्वीर्य तू पार्थ तुझे न शोभता यह । अपनी दुबली वृत्ति छोडके उठ तू अब ॥ ३ ॥ (3) ३३ सांख्ययोग
सोचकर देख तू अर्जुन । किस करुणासे उदासीन । कहो अंधेरेमें कैसे भानु । ढका आज ॥ १३ ॥ डरता क्या मेघसे पवन । है क्या अमृतको भी मरण । निगलता आगको ईंधन । सोचले तू ॥ १४ ॥ या नमकसे क्या पानी पिघलेगा । अन्य स्पर्शसे कालकूट मरेगा । अथवा महाशेषको निगलेगा । मंडूक अल्प ॥ १५ ॥ सिंहसे भिडे क्या जंबूक । ऐसा हुवा क्या अलौकिक । दिखाया है सच कौतुक । तूने आज ॥ १६ ॥ इसलिये सुन अर्जुन । न होने दो चितको दीन । धैर्य दो मनको तत्क्षण । सावध होके ॥ १७ ॥ छोड़ दो यह अज्ञान । उठालो तीर कमान । रणमें किसका कौन । कारुण्य कैसे ॥ १८ ॥ तू है बड़ा जानकार । रणमें दया विचार । करना ऐसा अपार । उचित है क्या ॥ १९ ॥ इससे कीर्तिका नाश । परलोक अप भ्रंश । कहता जगन्निवास । अर्जुनसे ॥ २० ॥ इसीलिये शोक न कर । मनमें तू धीरज धर । तज दे तू पांडुकुमार । इस शोकको ॥ २१ ॥ तुझे नहीं यह उचित । इसमें अकीर्ति बहुत । अब भी तू अपना हित । सोचले ठीक ॥ २२ ॥ संग्राम समयमें ऐसे । करुणासे हित हो कैसे । आप्त हुये क्या ये अभीसे । कहो मुझे ॥ २३ ॥ पहलेसे क्या जानता नहीं । संग्राम है कुल-जनसे ही । करता है यह अ-कारण ही । शोक तू पार्थ ॥ २४ ॥ यह संघर्ष नहीं आजका । यह चला है जन्म कालका । आज ही क्यों ऐसा करुणाका । पुलक उठा ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३४
अब ही क्या है हुआ ऐसा । आया यह तरस कैसा । अर्जुन यह विचित्र-सा । किया अनुचित ॥ २६ ॥ इस मोहसे ऐसा होगा । नाम जो था वह मिटेगा । परलोक साथ जायेगा । लौकिकके ॥ २७ ॥ शिथिलता ऐसी हृदयकी । कारण होगी जो अहितकी । जानो संग्राममें पतनकी । क्षत्रियोंके ॥ २८ ॥ ऐसा वह कृपावंत । सिखाता है जो सतत । सुन यह पांडुसुत । बोले ऐसा ॥ २९ ॥ अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हा वरिसूदन ॥ ४ ॥ अर्जुनका प्रत्युत्तर— देव सुनोजी इतना । कारण नहीं बोलना । अपनेमें ही सोचना । यह युद्ध है क्या ॥ ३० ॥ युद्ध नहीं यह अपराध । करना है कुलका उच्छेद । करना पडा यह प्रमाद । हमको यहां ॥ ३१ ॥ माता पिताका वंदन । देना उन्हे समाधान । छोड़ करना हनंन । उचित है क्या ॥ ३२ ॥ सन्त-वृंदका करे वंदन । हो सके तो करना पूजन । छोड़ सुनाना निंदा वचन । उचित है क्या ? ॥ ३३ ॥ हमारे कुल-गुरु ये ऐसे । वंदनीय हमें नियमसे । हमें पूज्य भीष्म द्रोण वैसे । सदा सर्वत्र ॥ ३४ ॥ जिनका वैर न करता है मन । स्वप्नमें भी यह असंभव जान । उनका करना प्रत्यक्ष हनन । कैसे देव ॥ ३५ ॥ रणमें मैं लडूं कैसे विरुद्ध भीष्म-द्रोणके कैसे मारूं इन्हे बाण हमें ये पूजनीय हैं ॥४॥ ३५ सांख्ययोग
अजी जलने दो ऐसा जीवन । सबका हुआ क्या अंतःकरण । वधमें क्या क्षात्रत्व- अभिमान । गुरुजनोंके ॥ ३६ ॥ पार्थका गुरु है यह द्रोण । दिया धनुर्विद्याका शिक्षण । है क्या उसकी यह दक्षिणा । वध करना ॥ ३७ ॥ जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार । ऐसां बनुं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ३८ ॥ गुरुनहत्वा हि महानुभावान श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुंजीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान ॥ ५ ॥ देख गंभीर होता सागर । वह भी है ऊपर ऊपर । न क्षोभता हृदय सागर । द्रोणका कभी ॥ ३९ ॥ अपार यह गगन । उसका भी होगा भान । अगाध अति गहन । है द्रोण हृदय ॥ ४० ॥ अमृत भी बिगडेगा । वज्र भी टूट जायेगा । किंतु दोष न आयेगा । इनके मनमें ॥ ४१ ॥ ममता होती है माताकी । ख्याति है इस बातकी । किंतु मूर्ति है ममताकी । द्रोणाचार्य ॥ ४२ ॥ ये हैं कारुण्यके आगर । सकल गुणोंके सागर । विद्या सिंधु हैं ये अपार । कहता पार्थ ॥ ४३ ॥ ऐसे हैं ये महान महत । हमसे हैं अति कृपावंत । अब कहो क्या करना घात । असंभव यह ॥ ४४ ॥ न मारके पूज्य आचार्य श्रेष्ठ जीना भला है भिक्षान्नसे ही । हितेच्छुओंके वधसे ये भोग किस भांति भोगें जो रक्त सिक्त ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६
ऐसोंको रणमें मारना । फिर राज्य सुख भोगना । इसका विचार करना । हे असंभव ॥ ४५ ॥ दूभर है राज्य भोग भोगना । इंद्रपद भी ग्रहण करना । इससे अधिक भला है जीना । भिक्षान्नसे ही ॥ ४६ ॥ न तो देश-त्याग कर जाना । गिरी-कंदरामें जा बसना । करमें शस्त्र नहीं धरना । इनके सम्मुख ॥ ४७ ॥ पैने शस्त्रोंसे मर्म-स्थान । करना इनका भेदन । फिर इनके खूनमें सान । पाना भोगैश्वर्य ॥ ४८ ॥ रक्त-सिक्त वे ऐसे । भोग भोगना कैसे । न जंचे मुझे ऐसे । वचन तेरे ॥ ४९ ॥ दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता— उस समयमें अर्जुन । कहता है कृष्ण तू सुन । किंतु वह न देता कान । सुन करके भी ॥ ५० ॥ यह जानकर चौंका अर्जुन । फिरसे बोला अपना वचन । देता नहीं तू देव अवधान । मेरी बात पर ॥ ५१ ॥ न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ जो विचार मेरे मनमें । बोला मैं वह इस स्थानमें । अब है भला जो करनेमें । जाने वह तू ही ॥ ५२ ॥ होगी हमारी जय या उन्हींकी किसमें भलायी यही न जानूं । हत्यासे जिनके जीना न चाहूं वही खडे हैं युद्धार्थ डटके ॥ ६ ॥ ३७ सांख्ययोग