ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपनोंका घात करना। फिर राज्य-सुख भोगना। मेरा यह सोच सकना। स्वप्नमें भी असंभव ॥ १३ ॥ गुरु जनोंका अहित करना। तो किसके लिये है जनमना। तथा किसके लिये कह जीना। शत्रुबुद्धिसे ॥ १४ ॥ पुत्रको चाहता है कुल। उसका क्या यही है फल। गोत्र-जन वध केवल। करना है क्या ॥ १५ ॥ वज्र सम है यह कठोर। कैसा करे इसका उच्चार। हमें करना मंगल कर। यथा संभव ॥ १६ ॥ हमको है जो जो करना। इन्ही सबको है भोगना। प्राण निछावर करना। इनके हित ॥ १७ ॥ बनकर विश्वके भूपाल। जीत करके विश्व सकल। रखना है अपना ही कुल। संतुष्ट सदा ॥ १८ ॥ वही है यहां समस्त। कैसा कर्म विपरीत। हुए वे सब उद्यत। युध्द करने ॥ १९ ॥ त्यज कर ये परिवार। वैसे ही गृह औ' भांडार। शस्त्रांपे रख तैयार। हुए हैं प्राण ॥ २० ॥ ऐसोंको मैं कैसे मारूं। किन पर शस्त्र धरूं। अपने हियका करूं। घात कैसा ॥ २१ ॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥ तू न जानता क्या ये हैं कौन। सम्मुख खडे हैं भीष्म द्रोण। इनके उपकार महान। हैं हमपर ॥ २२ ॥ वैसे साले श्वशुर मातुल। तथा अन्य बंधु हैं सकल। पुत्र पौत्र हैं अति केवल। आप्त जन सारे ॥ २३ ॥ दादा बाबा पुत्र पौत्र अपने दीखते यहां। गुरु औ' ससुरा साला सगे स्वजन हैं सभी ॥ २३४ ॥ ज्ञानेश्वरी २४