ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुनो हैं ये अतीव निकट के । आप्त जन सब परिवारके । इन्हें कटु बोलें तभी पापके । भागी हैं हम ॥ २४ ॥ एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥ चाहे सो इन्हें करने दो । हमको अभी मारने दो । किंतु मनमें न लाने दो । इनका अहित ॥ २५ ॥ मिले यदि विश्व साम्राज्य । तब भी हमें यह वर्ज्य । कार्य अनुचित जो त्याज्य । नहीं करूंगा ॥ २६ ॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाऽऽश्रयेदस्मान् हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥ यदि आज हम ऐसा करेंगे । कौन हमारा आदर करेंगे । तेरा दर्शन भी कैसा करेंगे । कह श्रीकृष्ण ॥ २७ ॥ वध करनेसे गोत्र जनोंका । घर बनके महा-पापका । खोऊंगा मैं तुझको हाथका । जो है अपना ॥ २८ ॥ कुल नाशके पापसे । पूर्णता डूब जानेसे । देखूंगा मैं तुझे कैसे । इस भांति ॥ २९ ॥ जैसे उद्यानमें अनल । लगा देख अति प्रबल । क्षण भी न रहे कोयल । स्थिर वैसे ॥ २३० ॥ स-कर्दम सरोवर । देख करके चकोर । करे उसका अव्हेर । वैसा ही तू ॥ ३१ ॥ अजी ओ मेरे देवराय ! । मिटनेसे पुण्य-संचय । छोड़कर होग अदृश्य । हमसे तब ॥ ३२ ॥ इन्हें न मारना चाहूँ यदि ये मारते मुझे । विश्व-साम्राज्य छोड़ूंगा पृथ्वीकी बात क्या भला ॥ ३५ ॥ घातसे कौरवोंका है क्या होगा अपना हित । भले ये आततायी हैं इनका घात पाप है ॥ ३६ ॥ २५ अर्जुनविषादयोग (4)