ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसेना अपनी संभालना । भीष्मके आधीन रहना । द्रोणसे कहा जी ! देखना । आप यह सकल ॥ २३ ॥ एककी रक्षा करना । मैं ही हूं ऐसा मानना । यही सच्चा है अपना । दल भार सारा ॥ २४ ॥ तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥ राजाकी इस बातसे । भीष्मने भी संतोषसे । किया जो महावेगसे । सिंहनाद ॥ २५ ॥ गूंजा जो वह अद्भुत । दोनो सेनामें आद्यंत । प्रतिध्वनि है ध्वनित । चहूं दिशामें ॥ २६ ॥ उस प्रतिध्वनिके साथ । वीरवृत्तिसे हो ज्वलंत । भीष्मदेवने भी घोषित । किया दिव्य शंख ॥ २७ ॥ दोनो ही नाद मिले घोर । मानो हुए त्रिलोक बधिर । जैसा पड़ा हो टूट कर । आकाश सर्व ॥ २८ ॥ कंपित हुआ अंबर । उछल उठा सागर । प्रक्षुभित चराचर । भयसे महा ॥ २९ ॥ महा घोषसे उठे गजर । जिससे भरे गिरिकंदर । हुई सेना सब रणातुर । स्फुरित हो महा ॥ ३० ॥ ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥ बढाने उनका हर्ष करके सिंह-गर्जन । प्रतापी वृद्ध दादाने बजाया शंख जोरसे ॥ १२ ॥ तब है शंख भेर्यादि रणवाद्य विचित्र जो । बजे जब सभी साथ हुवा शब्द भयंकर ॥ १३ ॥ १३ अर्जुनविषादयोग