ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरणवाद्य बजे जो एकत्र। भय फैलाते हुये सर्वत्र । आया हो जैसे प्रलय सत्र। इसी क्षणमें ॥ ३१ ॥ बज उठे बड़े ढोल । शंख झांज जो शिथिल । भयंकर कोलाहल । सुभटोंका ॥ ३२ ॥ ताल ठोकते आवेशसे । गोहारते त्वेश द्वेषसे । हाथी घोडे हैं उन्मादसे । अनावर ॥ ३३ ॥ कायरोंकी वहां क्या बात । कांच दिल गये उडत । कांप उठा स्वयं कृतांत । खडा न रहा ॥ ३४ ॥ कितनोंके बैठे हृदय । कितनोंका प्राण ही जाय । वीरोंकी कांपती है काया । उस नादसे ॥ ३५॥ ऐसा भयंकर रण गर्जन । सुन अकुलाया चतुरानन । प्रलय आ गया क्या इसी क्षण । बोले देव ॥ ३६ ॥ यह बात हुयी स्वर्गमें । आक्रोश देखके रणमें । यहां है पांडव दलमें । हुआ क्या ? ॥ ३७ ॥ ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥ रथ था जो विजय-गर्भका । या भांडार था महातेजका । और था चार श्वेत अश्वोंका । गरुड समान ॥ ३८ ॥ आया जैसा मेरु पंखोंका । वैसा आया रथ जो बांका । छितराते दिव्य शोभाका । प्रकाश सर्वत्र ॥ ३९ ॥ अश्व चालक स्वयं भगवान । वैकुंठका जो स्वामी महान । उस रथका है गुणवर्णन । करना ही क्या ॥ १४० ॥ ध्वज स्तंभ पर वानर । जो है मूर्त्तिमान शंकर । सारथी स्वयं शार्गधर । अर्जुनका ॥ ४१ ॥ यहां धवल घोडोंके महान रथमें बसे । कृष्ण अर्जुनने फूंके अपने दिव्य शंख भी ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी १४