भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 764

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥ सात्विक तप— तभी यह तप है त्रिविध । कहा है तुझसे प्रबुद्ध । वह करें हो पूर्ण श्रद्ध । छोडके फलाशा ॥ २४० ॥ वह संपूर्ण सत्व-शुद्धि । करता हो आस्तिक बुद्धि । तब उसको है सुबुद्धि । कहते तप सात्विक ॥ ४१ ॥ राजसिक तप— सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥ या करने तपका स्थापन । जगमें द्वैत कर उत्पन्न । प्राप्त करने सर्वोच्च स्थान । लोगोंमें तब ॥ ४२ ॥ तथा त्रिभुवनका सन्मान । नहीं पाये कोई अन्य जन । पंगतमें सर्वोच्च आसन । पाने भोजनमें ॥ ४३ ॥ अथवा विश्वके स्तोत्र । बनना है आप मात्र । विश्व ही अपनी यात्रा । करने आये ॥ ४४ ॥ तथा लोगोंसे ले पूजा विविध । आश्रय बने आप यह साध । इससे भोग भोगें सर्व-विध । इस आशासे ॥ ४५ ॥ करके अंगांगका श्रृंगार । सजाता है तपसे शरीर । तडपती बेचने शरीर । वेश्या जैसे ॥ ४६ ॥ रखके धन-मानमें आस । तपते हैं करके आयास । तब ऐसा ही तप राजस । कहलाता है ॥ ४७ ॥ त्रिविध तप जो सारा श्रद्धा उत्कट जोडके । तजके फलकी आशा होता है वह सात्विक ॥ १७ ॥ चाहके मान सत्कार करते दंभ-पूर्वक । वह चंचल तू जान तप राजस अस्थिर ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९२