ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 765, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहुरणी जब थन चूसता । गायके पास दूध न रहता । या जानवर खेतको चरता । न मिलती उपज ॥ ४८ ॥ तपका ऐसे प्रदर्शन । करनेसे वह अर्जुन । होता है फलसे विहीन । कष्टसे जो किया था ॥ ४९ ॥ देख कर ऐसे विफल । छोड़ता है तप सकल । तभी होता वह चंचल । तप राजस ॥ २५० ॥ जैसे अकालके बादल । भर देते नभ - मंडल । नहीं टिकते क्षण-काल । गरज कर भी ॥ ५१ ॥ राजस तप ऐसा होता । फलते निष्फल बनता । आचरणमें न टिकता । सिद्धि तक ॥ ५२ ॥ देख तू अब वही तप । किया जाता तामस रूप । इह-परमें परंतप । होता व्यर्थ ॥ ५३ ॥ मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥ तामसिक तप- केवल मूर्खताका संचार । जीवमें होकर धनुर्धर । माना जाता अपना शरीर । शत्रुरूप ॥ ५४ ॥ जहां पंचाग्निकी ज्वाल । जलाती देह सकल । मानो तन मन बल । बनाके समिधा ॥ ५५ ॥ मस्तकपे जलाते गुगूल । या पेटमें चुभाते हैं कील । या जलाते हैं अंग सकल । आगसे अपना ॥ ५६ ॥ तथा रोककर श्वासोच्छ्वास । करते व्यर्थ ही उपवास । या करते धूममें वास । हो अधोमुख ॥ ५७ ॥ हठसे जो किया जाता करके आत्म-पीडन । तथा जो पर-घातार्थ कहाता तप तामस ॥ १९ ॥ ६९३ श्रद्धा-निरूपण-योग