ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा हिमोदकमें आकंठ । नदीमें या पाषाणपे बैठ । जीते मांसके टुकडे काट । डालते हैं ॥ ५८ ॥ ऐसे भांति भांतिसे काया । जला घुलाके धनंजया । नाशार्थ तप कहलाया । दूसरोंके ॥ ५९ ॥ अंग-भारसे छूटा पाषाण । गिरके टूटता आप जान । आता है जो उसका हनन । करता राहमें ॥ २६० ॥ अपनेको देकर दुःख । पाते रहते हैं जो सुख । करने उन्हे अधोमुख । तप जो करते ॥ ६१ ॥ ऐसे दुःखका कर स्वीकार । करते हैं तप धनुर्धर । स्व-पर घातक हैं जो घोर । तप तामस ॥ ६२ ॥ ऐसे सत्त्वादिके कारण । होते तपके प्रकार तीन । उसको व्यक्त किया है जान । स्पष्ट रूपसे ॥ ६३ ॥ करनेमें अब कथन । सहज प्रसंग है जान । कहता दानका लक्षण । तीन प्रकारके ॥ ६४ ॥ इन्ही गुणके कारण । दान भी त्रिविध जान । वही तू पहले सुन । सात्विक कैसे ॥ ६५ ॥ दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥ सात्विक दान— करते स्वधर्माचरण । पाया है आप जो धन । उसको देना स-संमान । किसी समय ॥ ६६ ॥ मिलता सु-बीज प्रसंग । नहीं मिलता खेत चांग । ऐसा यह दानका योग । दीखता मुझे ॥ ६७ ॥ अनर्घ्य रत्न चढ़ता हाथ । तब स्वर्ण न मिलता पार्थ । दोनो मिलते हैं एक साथ । न आता ऐसा योग ॥ ६८ ॥ धर्मके भावसे देना उपकार न चाहके । देश काल तथा पात्र देखके दान सात्विक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ६९४