भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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हवनादि जो अग्निमें । त्यागादिरूप आहुतिमें । यज्ञ-विविध विधानोंमें । करते निष्णात ॥ ६१ ॥ ऐसे विविध-रूप याग । निष्पन्न होकर तदंग । करते हैं उपाधि त्याग । जो हैं असार ॥ ६२ ॥ या न्यायसे प्राप्त पवित्र । भूमि आदि जो स्वतंत्र । देश-कालादि शुद्ध पात्र । देख देते दान ॥ ६३ ॥ अथवा एकांतर कृच्छ्रादिव्रत । चांद्रायण मासोपवास सहित । शोषण कर देह-धातुका नित । करते हैं तप ॥ ६४ ॥ एवं यज्ञ दान तप । प्रसिद्ध बंधन-रूप । बना लेते परंतप । मोक्ष-साधन ॥ ६५ ॥ स्थल पर जो है महा बोझ । नांव तैराती जलमें तुझ । बंधनसे मुक्त जो सहज । करता नाम वैसे ॥ ६६ ॥ ऐसे वे सब धनंजया । यज्ञादिक हैं सभी क्रिया । ओंकारके लेके सहाय । चलते हैं ॥ ६७ ॥ तथा होती जब फलाशा स्पर्श । तब सावध साधक सोल्हास । उच्चार कर तत्कार विशेष । करते अर्पण ॥ ६८ ॥

तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियंते मोक्षकांक्षिभिः ॥ २५ ॥

तत्कारसे होनेवाले लाभ— वस्तु है जो विश्वातीतः । तथा जो विश्व-लक्षित । ऐसे तत् शब्दसे व्यक्त । होती है वर वस्तु ॥ ६९ ॥ चित्तमें सर्वांदिकत्व नित । ध्यान करके तद्रूप पार्थ । उच्चार करके अभिव्यक्त । करते स्पष्ट ॥ ३७० ॥

तत् के स्मरणसे सारी टूटती फल-वासना । नाना यज्ञ तप दान करते मोक्ष साधक ॥ २५ ॥

५०३ श्रद्धा-निरूपण-शोध

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