ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया स्नेह बात इक ठौर । आने पर पांडुकुमार । जलाना न जाने पर । प्रकाश कैसे ? ॥ ५१ ॥ आया कृत्य समय अर्जुन । तथा मंगलका हुवा स्मरण । किंतु कार्य है वह अपूर्ण । बिना प्रयोगके ॥ ५२ ॥ तभी वर्ण-त्रयात्मक । पर-ब्रह्म नाम एक । विनियोग सुन नेक । इस समय ॥ ५३ ॥ तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥ नामके हैं जो तीन अक्षर । कर्मके आदि मध्य नंतर । प्रयोग करना सविचार । यही तीन ॥ ५४ ॥ ओंका महत्व— यही हाथ दीप लेकर । करने ब्रह्म साक्षात्कार । आये हैं सब धनुर्धर । ब्रह्म-ज्ञानी ॥ ५५ ॥ ब्रह्मसे होनेमें अद्वैत । यज्ञसे न होते वंचित । जानते शास्त्रोंको जो पार्थ । किसी समय ॥ ५६ ॥ सर्व-प्रथम वे ओंकार । ध्यानसे करते गोचर । फिर करते हैं उच्चार । वाणीसे भी ॥ ५७ ॥ उसके ध्यानसे प्रकट । प्रणवोच्चार होता स्पष्ट । तब करते हैं वे श्रेष्ठ । क्रियाचरण ॥ ५८ ॥ अंधेरेमें जैसे दीप अभंग । अरण्यमें समर्थ साथी संग । वैसे जानना प्रणवका योग । कार्यारंभमें ॥ ५९ ॥ धर्म-मार्गसे पाया हुवा धन । वेदोक्त देवोद्देश्यसे अर्जुन । यज्ञोंमें ब्राह्मणोंद्वारा अर्पण । करते हैं जो ॥ ३६० ॥ सदा प्रथम ओंकार बोल कर उपासक । करते हैं अनुष्ठान यज्ञ दान तपादिक ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०२