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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

या स्नेह बात इक ठौर । आने पर पांडुकुमार । जलाना न जाने पर । प्रकाश कैसे ? ॥ ५१ ॥ आया कृत्य समय अर्जुन । तथा मंगलका हुवा स्मरण । किंतु कार्य है वह अपूर्ण । बिना प्रयोगके ॥ ५२ ॥ तभी वर्ण-त्रयात्मक । पर-ब्रह्म नाम एक । विनियोग सुन नेक । इस समय ॥ ५३ ॥ तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥ नामके हैं जो तीन अक्षर । कर्मके आदि मध्य नंतर । प्रयोग करना सविचार । यही तीन ॥ ५४ ॥ ओंका महत्व— यही हाथ दीप लेकर । करने ब्रह्म साक्षात्कार । आये हैं सब धनुर्धर । ब्रह्म-ज्ञानी ॥ ५५ ॥ ब्रह्मसे होनेमें अद्वैत । यज्ञसे न होते वंचित । जानते शास्त्रोंको जो पार्थ । किसी समय ॥ ५६ ॥ सर्व-प्रथम वे ओंकार । ध्यानसे करते गोचर । फिर करते हैं उच्चार । वाणीसे भी ॥ ५७ ॥ उसके ध्यानसे प्रकट । प्रणवोच्चार होता स्पष्ट । तब करते हैं वे श्रेष्ठ । क्रियाचरण ॥ ५८ ॥ अंधेरेमें जैसे दीप अभंग । अरण्यमें समर्थ साथी संग । वैसे जानना प्रणवका योग । कार्यारंभमें ॥ ५९ ॥ धर्म-मार्गसे पाया हुवा धन । वेदोक्त देवोद्देश्यसे अर्जुन । यज्ञोंमें ब्राह्मणोंद्वारा अर्पण । करते हैं जो ॥ ३६० ॥ सदा प्रथम ओंकार बोल कर उपासक । करते हैं अनुष्ठान यज्ञ दान तपादिक ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०२

हवनादि जो अग्निमें । त्यागादिरूप आहुतिमें । यज्ञ-विविध विधानोंमें । करते निष्णात ॥ ६१ ॥ ऐसे विविध-रूप याग । निष्पन्न होकर तदंग । करते हैं उपाधि त्याग । जो हैं असार ॥ ६२ ॥ या न्यायसे प्राप्त पवित्र । भूमि आदि जो स्वतंत्र । देश-कालादि शुद्ध पात्र । देख देते दान ॥ ६३ ॥ अथवा एकांतर कृच्छ्रादिव्रत । चांद्रायण मासोपवास सहित । शोषण कर देह-धातुका नित । करते हैं तप ॥ ६४ ॥ एवं यज्ञ दान तप । प्रसिद्ध बंधन-रूप । बना लेते परंतप । मोक्ष-साधन ॥ ६५ ॥ स्थल पर जो है महा बोझ । नांव तैराती जलमें तुझ । बंधनसे मुक्त जो सहज । करता नाम वैसे ॥ ६६ ॥ ऐसे वे सब धनंजया । यज्ञादिक हैं सभी क्रिया । ओंकारके लेके सहाय । चलते हैं ॥ ६७ ॥ तथा होती जब फलाशा स्पर्श । तब सावध साधक सोल्हास । उच्चार कर तत्कार विशेष । करते अर्पण ॥ ६८ ॥

तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियंते मोक्षकांक्षिभिः ॥ २५ ॥

तत्कारसे होनेवाले लाभ— वस्तु है जो विश्वातीतः । तथा जो विश्व-लक्षित । ऐसे तत् शब्दसे व्यक्त । होती है वर वस्तु ॥ ६९ ॥ चित्तमें सर्वांदिकत्व नित । ध्यान करके तद्रूप पार्थ । उच्चार करके अभिव्यक्त । करते स्पष्ट ॥ ३७० ॥

तत् के स्मरणसे सारी टूटती फल-वासना । नाना यज्ञ तप दान करते मोक्ष साधक ॥ २५ ॥

५०३ श्रद्धा-निरूपण-शोध

यह हो तद्रूप ब्रह्मार्पण । न रहे यहां फल-कारण । भोग रूप न रहे स्मरण- । बीजका भी ॥ ७१ ॥ ऐसे तदात्मक जो ब्रह्म । साकार यहां सब कर्म । कह कर इदं न मम । झटक देते हैं ॥ ७२ ॥ ओंकारसे ऐसे प्रारंभ कर । तथा तत्कारमें अर्पण कर । कर्मको बनाया इस प्रकार । ब्रह्मकर्म ॥ ७३ ॥ हुवा वह कर्म ब्रह्मकार । इससे न होता कार्य भार । कर्ता कर्मका रहा विचार । भिन्नत्वका जो ॥ ७४ ॥ रूपसे लवण घुल जाता । किंतु स्वादसे जो रह जाता । वैसे द्वैत-भावसे रहता । कर्ता जो भिन्न ॥ ७५ ॥ रहता जब द्वैतका भान । होता भव-भयका कारण । ऐसे स्वमुखसे हैं श्रीकृष्ण । बोलते वेद ॥ ७६ ॥ तभी जो परत्वमें ब्रह्म रहता । उसको आत्मत्वमें जानना होता । सत् शब्द ऋण दोषार्थ रखता । यहां श्रीकृष्ण ॥ ७७ ॥ तो भी यहां ओंकार तत्कारमें । ब्रह्म-कर्म किया जो शरीरमें । वह कर्म प्रशस्तादि शब्दोंमें । किया है बखान ॥ ७८ ॥ उस प्रशस्त कर्ममें है । सत् शब्दका विनियोग है । वहीं जो प्रभु कहता है । सुनो अब ॥ ७९ ॥ सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥ सत् भावसे होनेवाले लाभ— सत् शब्दका यहां सारांश । असत् नाट्यका हो निरास । दीखते हैं रूप निर्दोष । सत्ताका यहां ॥ ३८० ॥ सत्का स्मरण देता है सत्यता और साधुता । वैसे ही कर्म-सौंदर्य कहा सत्कारका फल ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०४

जिस सत्तांका रूप संतत । रहता है स्थल-कालातीत । तथा होता है जो अखंडित । अपने आपमें ॥ ८१ ॥ जितना जो है यह दीखता । असत् यह वह नहीं होता । रूप जो यह जानता पाता । उसका आश्रय ॥ ८२ ॥ इससे वह् प्रशस्त कर्म । हुवा है जो सर्वात्मक ब्रह्म । कर देखना उससे सम । ऐक्य बोधसे ॥ ८३ ॥ ओंकार तथा जो तत्कार । दिखाता कर्म ब्रह्माकार । होना उसे निगलकर । केवल ब्रह्म ॥ ८४ ॥ ऐसा यह अंतरंग । सत् शब्दका विनियोग । कहता यह श्रीरंग । मैं नहीं कहता ॥ ८५ ॥ यदि कहता मैं, मैं यह कहता । श्रीरंगमें द्वैतकी आती हीनता । इसीलिये यह वचन है कहता । श्रीहरिका ही ॥ ८६ ॥ सत् शब्दका और एक अर्थ— अब और ही एक प्रकार । सत् शब्दका सुन तू धनुर्धर । करता सात्विक कर्म पर । उपकार जो ॥ ८७ ॥ सत्कर्म चलते हैं सुंदर । अपने अधिकारानुसार । जब कोई अंग धनुर्धर । होता हीन कस ॥ ८८ ॥ एक अवयवकी दुर्बलता । शरीर व्यापारको ही रोकता । या किसी अंगसे है रुक जाता । रथका वेग ॥ ८९ ॥ वैसे ही एक गुणके बिन । संतमें आता असंतपन । तब सत्कर्म बनाता है जान । असत्कर्म ॥ ३९० ॥ तब ओंकार तथा तत्कार । करते हैं कर्मको सुंदर । वैसे ही उसका जीर्णोद्धार । करता सत् शब्द ॥ ९१ ॥ कर्मके असत्‌को यह मिटाता । उसमें सद्भाव रूढ करता । निज सत्त्वकी प्रौढ़ता बढ़ाता । यह सत् शब्द ॥ ९२ ॥ दिव्यौषधिसे रोगीको जैसे । असहायको सहायतासे । कर्म-व्यंगमें सत् शब्द वैसे । करता पूर्ण ॥ ९३ ॥ (84) ७०५ श्रद्धा-निरूपण-योग

अथवा हो कोई प्रमाद । कर्म छोडकर मर्यादा । भूलसे राहपे निषिद्ध । राहपे वहां ॥ ९४ ॥ चलते हुए भी मार्ग भूलता । तज्ञोंकी दृष्टिमें वह आता । व्यवहारमें क्या नहीं होता । कह तू मुझे ॥ ९५ ॥ इसीलिये ऐसे जो कर्म होते । अविचारसे सीमाको लांघते । असाधुता दुर्नाम पहुंचते । उस समय ॥ ९६ ॥ वहां पर यह सत् शब्द । उन दोनोंसे है प्रबुद्ध । नियोजित साधुता-सिद्ध । उस कर्मका ॥ ९७ ॥ जैसे लोह पारसकी दृष्टि । नाला और गंगाकी भेटी । अथवा मृत पर हो वृष्टि । अमृतकी जैसे ॥ ९८ ॥ असाधु कर्ममें अर्जुन । सत् शब्द प्रयोग तू जान । रहता है जो बड़प्पन । इस शब्दका ॥ ९९ ॥ जान कर यह सब मर्म । विचार करेगा यह नाम । यही है केवल पर-ब्रह्म । अनुभवेगा तू ॥ ४०० ॥ यह नाम शुद्ध पर-ब्रह्म है— देख तू यह ओं' तत् सत् ऐसे । वहां पहुंचते बोलनेसे । सब प्रकाशता है जहांसे । दृश्य विश्व यह ॥ १ ॥ वह है पूर्ण निर्धर्म । शुद्ध ऐसा पर-ब्रह्म । यह अंतरंग नाम । करता व्यक्त ॥ २ ॥ आश्रय आकाशका जैसा । केवल आकाश है वैसा । यह नाम सबमें वैसा । है अभेद ॥ ३ ॥ आकाशमें जो उदय होता । सूर्य ही सबको प्रकाशता । वैसे है नाम ही प्रकाशता । नामीको यहां ॥ ४ ॥ तभी तीन अक्षरोंका नाम । नाम नहीं है केवल ब्रह्म । यह जान कर जो जो कर्म । किया जाता है ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०६

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥ याग हो अथवा दान । तथा तपादि गहन । पूर्ण अथवा अपूर्ण । रहे वह ॥ ६ ॥ पारसकी कसौटी पर जैसे । भले बुरेकी बात न हो वैसे । ब्रह्ममें अर्पण करते जिसे । वह है ब्रह्म-रूप ॥ ७ ॥ नहीं रहते पूर्ण या अपूर्ण । किये जाते कर्म जो ब्रह्मार्पण । देखी न जाती सिंधुमें अर्जुन । जैसे नदियां ॥ ८ ॥ ऐसे पार्थ तेरे प्रति । ब्रह्म नामकी है शक्ति । कही है स-उपपत्ति । बुद्धिमान तू ॥ ९ ॥ तथा एकेक अक्षर । भिन्न भिन्न स्पष्ट कर । विनियोग धनुर्धर । कहा तुझसे ॥ ४१० ॥ अब ऐसे सु-महिम । इसीलिये है ब्रह्मनाम । जान लिया न यह मर्म । तूने अर्जुन ॥ ११ ॥ तभी इस पर श्रद्धा । बढ़ती रहने दो सदा । उसका विनियोग कदा । रुकने न देना ॥ १२ ॥ जिस कर्ममें यह प्रयोग । अनुष्ठान किया सद्द्विनियोग । वहां अनुष्ठान किया सांग । वेदविदित ॥ १३ ॥ अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥ तप यज्ञ तथा दान करता कर्म साधक । उसमें बरता जाता उसको सत् कहा गया ॥ २७ ॥ अश्रद्धासे किया कर्म यज्ञ दान तपादिक । असत् वह कहा जाता होता सर्वत्र निष्फल ॥ २८ ॥ ७०७ श्रद्धा-निरूपण-योग

श्रद्धाहीन कार्य कभी सफल नहीं होता— अथवा नामको छोड़कर । तोड़कर श्रद्धाका आधार । दुराग्रह बल बढ़ाकर । धनंजय ॥ १४ ॥ अश्वमेघ किये अगणित । रत्नमय पृथ्वी-दान पार्थ । एकांगुष्ठ तप भी सतत । किया गया ॥ १५ ॥ जलाशयके नाम पर । बन गये नये सागर । किंतु वे सब धनुर्धर । व्यर्थ ही मान ॥ १६ ॥ पत्थर पर मेघ बरसना । या राखमें हवन किया जाना । या प्रेमसे आलिंगन करना । अपनी छायाका ॥ १७ ॥ या आकाशको बेंत । मारना जैसे पार्थ । वैसे ही सब है व्यर्थ । यह समारोह ॥ १८ ॥ कोल्हूमें कंकडका घान डाला । उससे न खली न तेल मिला । किंतु अपना दारिद्र्य सकल । रहा साथ ही ॥ १९ ॥ गांठमें बंधा हुवा ढेला । यहां या वहां नहीं चला । जिससे मर गया भला । उपवाससे ॥ ४२० ॥ वैसे कर्म जात सफल । नहीं देते हैं यहां फल । तब होंगे वहां विफल । कहना रहा क्या ॥ २१ ॥ ब्रह्म नामकी श्रद्धा तजकर । करनेमें ये सभी व्यवहार । व्यर्थ ही जान तू पांडुकुमार । केवल दिखानेके ॥ २२ ॥ जो कलुष-कुल-केसरी । त्रिताप-तिमिर-तमारी । वीरवर श्रीनरहरी । बोलते ऐसे ॥ २३ ॥ निजानन्दमें तद्रूप । हुवा तब परंतप । चंद्रमा जैसे तद्रूप । होता चांदनीसे ॥ २४ ॥ अजी ! यह युद्ध ऐसा देखा । वाणी तथा बाणके जो नोक । नापते हैं जीव सह एकेक । मांस खंड ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०८

इस भांति कर्कश समय । भोगता है जो स्वानंदराज्य । आज जो है यहां भाग्योदय । नहीं अन्यत्र ॥ २६ ॥ संजय कहता है कुरु-श्रेष्ठ । शत्रुके गुणसे होता संतुष्ट । यहां वह गुरु भी बना श्रेष्ठ । आत्मसुखकर ॥ २७ ॥ यदि यह प्रश्न नहीं करता । श्रीहरि ऐसे क्यों गांठ खोलता । तथा कैसे हमें ज्ञान मिलता । परमार्थका ॥ २८ ॥ अज्ञानके अंधेरेमें होते । जन्म मृत्युकी राह चलते । यहां आकर कैसे पहुंचते । आत्म प्रकाश सदनमें ॥ २९ ॥ हमें तुम्हें किया अपार । इसने यह उपकार । तभी हैं व्यास-सहोदर । गुरुत्वमें यह ॥ ४३० ॥ संजय कहता मनही मन । बढ गया मेरा यह कथन । खटकेगा धृतराष्ट्रको जान । कितना बोला मैं ॥ ३१ ॥ ऐसे अर्जुन गुण-वर्णन । छोडकर वैसे ही अपूर्ण । कहता पूछता क्या अर्जुन । श्रीहरिसे तब ॥ ३२ ॥ छोडकर अर्जुनका गुण-वर्णन । संजय कहता श्रीकृष्णका व्याख्यान । वैसेही मैं भी करूंगा सुनो व्याख्यान । ज्ञानदेव निवृत्तिका ॥ ३३ । गीता श्लोक २८ ओवी ४३३ ॐ ७०९ श्रद्धा-निरूपण-योग

१८ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग चित्सूर्यरूपी श्रीगुरु वंदन— जय जय देव निर्मल । निज-जनाखिल मंगल । जन्म-जरा-जलद-जाळ । प्रभंजन ॥ १ ॥ जय जय देव प्रबल । विदलित मंगल कुल । निगमागमद्रुम-फल । फलप्रद ॥ २ ॥ जय जय देव सकल । विगत विषयवत्सल । कलितकालकौतूहल । कालातीत ॥ ३ ॥ जय जय दैव निष्कल । स्फुरदमंदानंद बहुल । नित्य निरस्ताखिलमल । मूलभूत ॥ ४ ॥ जय जय देव स्वप्रभ । जगदंबुगव्हर्गर्भ नभ । भुवनोद्भावारंभ-स्तंभ । भवध्वंस ॥ ५ ॥ जय जय देव निश्चल । चिलित-चित-पान तुंदिल । जगदुन्मीलनाविरल- । केलिप्रिय ॥ ६ ॥ जय जय देव विशुद्ध । विदुदयोद्यान-द्विरद । शम-दम-मदन-मद-भेद । दयार्णव ॥ ७ ॥ जय जय देवैकरूप । अतिकृत-कंदर्प-सर्प-दर्प । भक्त-भाव-भुवन-दीप । तापावह ॥ ८ ॥ जय जय देव अद्वितीय । परिणतोपरमैकप्रिय । निज-जन-नित-भजनीय । मायागम्य ॥ ९ ॥

जय जय देव श्रीगुरु । अकल्पनाख्य कल्पतरु । स्वसंविद्रुमबीजप्ररु । भूमिरूप ॥ १० ॥ निर्विशेष तेरा स्तवन कैसे करूं ?— यह क्या एकेक कर ऐसे । अनेक परिभाषासे कैसे । स्तोत्र करूं तव उद्देश्यसे । निर्विशेष ॥ ११ ॥ जिन विशेषणसे करना वर्णन । वह दृश्य-रूप तेरा न होता जान । लज्जित होता हूं करनेमें स्तवन । तेरा मैं श्रीगुरु ॥ १२ ॥ किंतु जो मर्यादाका सागर । ऐसी उसकी ख्याति सादर । किंतु न देखता सुधाकर । हुवा उदय ॥ १३ ॥ निज-निर्झरसे वह सोमकांत । चंद्रको अर्घ्य न देता यदि रात । तब उससे दिलाता निशा-नाथ । सुनो देव ॥ १४ ॥ न जाने कैसे वसंत आता । सहसा खिलते वृक्ष-लता । किंतु आप न रोक सकता । खिलता वृक्ष ॥ १५ ॥ पद्मिनी पाकर रवि-किरण । सिकुडना जानती कहां कौन । या जल-स्पर्श होते ही लवण । भूलता अंग ॥ १६ ॥ वैसे मैं करता तेरा स्मरण । होता मैं मेरा यह विस्मरण । डकार रोक न सकता जान । तृप्त जैसे ॥ १७ ॥ तूने मुझे किया ही है ऐसे । मेरा मैं-पन मिटा देनेसे । स्तवनार्थ पागल-पनसे । नाचती वाचा ॥ १८ ॥ अथवा मैं वैसे ही सचेतन । रहके करूंगा तेरा स्तवन । जिससे गुण-गुणीकी तुलना । होगी मुझसे ॥ १९ ॥ तथा तू है एकरस अखंड । कैसे करें गुण-गुणीका खंड । मोति भला क्या तोडकर जोड़ । या समूचा वैसेही ॥ २० ॥ और तू है माता तथा पिता । इससे स्तवन नहीं होता । लगती उपाधिकी भृष्टता । पुत्रत्वकी मात्र ॥ २१ ॥ ७११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

दूसरेकी करनेसे दासता । आई हुई पराधीन श्रेष्ठता । उपाधि उच्छिष्टका है क्या होता । बखाननेसे ॥ २२ ॥ तब तू आत्मा एक समान । ऐसे कहनेसे भी श्रीमान् । दृश्यादृश्यको बाहर मान । ढकेलता हुवा ॥ २३ ॥ मौन भूषणादिसे गुरु पूजन— तभी करनेमें तेरा वर्णन । नहीं मिलता योग्य विशेषण । तब मौन बिन अन्य भूषण । नहीं चढाता मैं ॥ २४ ॥ स्तवन है कुछ भी न बोलना । पूजा है कुछ भी न करना । सन्निधिमें कुछ भी न होना । तेरे पास ॥ २५ ॥ किंतु जैसे कोई भ्रम-ग्रस्त । करता है प्रलाप बहुत । वैसे मैं वर्णन गुरु-मात । कहता सहले तू ॥ २६ ॥ अब दे अपना स्वाक्षर । हुवा जो गीतार्थ विस्तार । जिससे हो यह स्वीकार । सज्जनोंमें ॥ २७ ॥ कहते हैं श्रीनिवृत्तिनाथ यह । बार बार पूछता क्यों वह । कह तू पारसपे घिसते क्यों लोह । बार बार ॥ २८ ॥ ज्ञानदेव तब विनयकर । आपका प्रसाद है गुरुवर । सुनना जी अब चित्त देकर । ग्रंथ संवाद ॥ २९ ॥ गीत-रत्न प्रासादका कलशाध्याय— अजी ! यह गीता-रत्न-प्रासादका । कलशही है अर्थ चिंतामणिका । अथवा है सभी गीता-दर्शनका । है पथ-दीप ॥ ३० ॥ लोगोंमें रही है यह मान्यता । जब दूरसे कलश दीखता । तब तो सहज दर्शन होता । देवताका भी ॥ ३१ ॥ अजी ! उसी भांति है यहां । एक ही अध्यायमें जहां । पूर्ण-दर्शन होता है यहां । गीतागमका ॥ ३२ ॥ कलश है यह इसी कारण । अध्याय यह बादरायण । अठारहवा जो सकारण । रचते हैं ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१२

कलशके बाद कुछ भी कहीं । मंदिरका काम रहता नहीं । यह बात अष्टादशमें यहीं । दीखती स्पष्ट ॥ ३४ ॥ व्यास सहज सशक्त सूत्रकार । उसने निगम-रत्नाचल पर । उपनिषदार्थके पठार पर । किया खनन ॥ ३५ ॥ वहां जो त्रिवर्गका असार । मिला माटी कंकड़ादि अपार । उससे महा-भारत प्राकार । रचा चतुर्दिक ॥ ३६ ॥ आत्म-ज्ञानका वहां अखंड । मिला जो सुंदर शिला-खंड । रची पार्थ-कृष्णकी अखंड । संवाद कलाकृति ॥ ३७ ॥ निवृत्ति-सूत्रका अधिष्ठान । सर्व-शास्त्रार्थका है भरण । आकार लाया बादरायण । मोक्ष-रेखाका ॥ ३८ ॥ करनेमें ऐसा यह निर्माण । पंद्रह अध्यायका है सदन । हुए हैं पंद्रह अंतस्त मान । इस प्रासादके ॥ ३९ ॥ षोडश अध्याय ऊपर । ग्रीवा घंटाका जो आकार । तथा कलश-पीठाकार । सप्तदश जो ॥ ४० ॥ उस पर यह अष्टादश । अपने आप हुवा कलश । ऊपर गीताविकमें व्यास । लगाता है ध्वज ॥ ४१ ॥ पिछले सभी अध्याय । चढते भूमिका आय । पूर्णता दिखाते जाय । अपनेसे ॥ ४२ ॥ हुए कार्यमें रही जो अपूर्णता । कलशमें होगी वह पूर्णता । वैसे अष्टादश विचार कहता । साद्यंत गीताका ॥ ४३ ॥ व्यास बडा कारीगर । रचा गीताका मंदिर । किया महा उपकार । प्राणि मात्रका ॥ ४४ ॥ कोई है परिक्रमा जपकी । करते बाहरसे इसकी । कोई श्रवणार्थ हैं छायाकी । धरते अपेक्षा ॥ ४५ ॥ तथा अवधानका संपूर्ण । देकर कोई दक्षिणा-धन । पैठते अंतर्गृहमें तत्क्षण । अर्थ ज्ञानके ॥ ४६ ॥ ७१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

फिर पाते निज-बोधसे तत्काल । आत्म-रूप हरि-दर्शनका फल । ऐसे मोक्ष प्रासादमें है सकल । पाते हैं प्रसाद ॥ ४७ ॥ जैसे समर्थोंका पंक्ति भोजन । देता सबको एकसा पकवान । श्रवण पठन अर्थ-चिंतन । मोक्ष देता इसका ॥ ४८ ॥ गीता यह ऐसा वैष्णव-प्रासाद । अठारहवा कलश है विशद । मैंने कहा है जानेका यह भेद । इस स्थान पे ॥ ४९ ॥ सत्रहवे और अठारहवे अध्यायका संबंध— समाप्त होता है सत्रहवां अध्याय । वहां होता कैसे अठारहवां उदय कहूंगा यह प्रत्यक्ष-सा दृश्य । आंखमें दीखे वैसे ॥ ५० ॥ न तोडके दोनों आकार । बनाया है एक शरीर । है अर्धनारी नटेश्वर- । रूपमें जैसे ॥ ५१ ॥ या गंगा-यमुनाका उदक । प्रवाहमें भिन्न है जो देख । तथा पानी रूपसे एक । दीखता सदैव ॥ ५२ ॥ अथवा शुक्ल-पक्षमें जैसे । नाना चंद्रकला दीखती वैसे । पूर्णमासीका पूर्ण चंद्र जैसे । दीखता एक ॥ ५३ ॥ जैसे भिन्न होनेसे सब पद । श्लोकके होते हैं श्लोकावछेद । अध्यायके होते अध्याय भेद । इसी भांति ॥ ५४ ॥ किंतु कहते हैं एक ही प्रमेय । मिलकर ये अष्टादश अध्याय । नाना रत्नोंको पिरोती साभिप्राय । जैसे एकही डोरी ॥ ५५ ॥ अनेक मोतियां मिलकर । होता जैसा एकावली हार । किंतु शोभा दीखती सुंदर । एकही अखंड ॥ ५६ ॥ गिन सकते हैं वृक्षके सभी फूल । सौरभपे उंगली न पडे सरल । अध्यायोंमें श्लोक हैं वैसे ही अचल । जानना यहां ॥ ५७ ॥ यहां है जो सात शत श्लोक । अष्टादश अध्यायमें लेख । किंतु देव बोलता है एक । दूसरा नहीं ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१४

तथा मैने भी यह तजकर । नहीं किया है ग्रंथका बिस्तार । यहांपे भी कहता सविस्तर । निरूपणमें एक ॥ ५९ ॥ जहां सत्रहका अध्याय । कहते अंतके समय । कहता देव साभिप्राय । इस प्रकार ॥ ६० ॥ ब्रह्म नाममें श्रद्धा रखकर । किये जाते जितने व्यवहार । होते वह सब व्यर्थ आखर । निश्चित जान ॥ ६१ ॥ सुनकर यह श्रीहरिका बोल । डुलता है मनमें पार्थ निर्मल । कहता कर्म-निष्ठोंका है सकल । बना निम्न रूप ॥ ६२ ॥ अज्ञानसे अंध जो कर्म-जड़ । ईशको न देख सकता मूढ़ । उसके नाम श्रद्धादि जो गूढ़ । जानेगा कैसे ॥ ६३ ॥ तथा रज और तमोगुण । नहीं तजता अंतःकरण । तब होती है जो श्रद्धा क्षीण । जुडती कैसे ब्रह्मसे ॥ ६४ ॥ फिर शस्त्र-नोकसे गले लगना । तथा खडी डोरीपे दौड़ते जाना । अथवा मानो नागिनसे खेलना । होंगे कम धातुक ॥ ६५ ॥ कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ? अठारहवेका सूत्र— ऐसे कर्म अति कठिन । देते हैं पुनः पुनः जनन । इस भांति कुयोग-पूर्ण । होते हैं जो ॥ ६६ ॥ होता यदि कर्म सांग संपूर्ण । बनता है ज्ञानके ही समान । नहीं तो देता नरक महान । यही कर्म ॥ ६७ ॥ कर्ममें हैं इस प्रकार । आते हैं दोष बार बार । तब कहां मोक्षका द्वार । खुलेगा कर्मठको ॥ ६८ ॥ मिटाना है यदि कर्म-संग । करके उसका पूर्ण त्याग । स्वीकार करना जो अव्यंग । संन्यास यहां ॥ ६९ ॥ कर्म-बाधाकी जो कहीं । भयकी बातही नहीं । वह आत्म-ज्ञान यहीं । होता हस्तगत ॥ ७० ॥ ७१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

ज्ञानका आवाहन-मंत्र । ज्ञान फलनेका सु-क्षेत्र । तथा ज्ञानाकर्षक-सूत्र । तंतु ही जो ॥ ७१ ॥ यह दोनों संन्यास और त्याग । आचरनेसे छूटता जग । तब इस बातमें हो सजग । पूछना स्पष्ट ॥ ७२ ॥ ऐसे विचार कर अर्जुन । त्याग संन्यासका पक्व ज्ञान । जान लेनेमें करता प्रश्न । इस स्थानपे ॥ ७३ ॥ उसके उत्तरमें श्रीकृष्ण । करता है जो यहां कथन । उससे व्यक्त हुवा संपूर्ण । अष्टादशाध्याय ॥ ७४ ॥ एवं यहां ले जन्य-जनक भाव । होता अध्यायसे अध्याय प्रसव । अब प्रश्न किया वह सावयव । सुनलें सब ॥ ७५ ॥ कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन— वहां जो श्रीकृष्णका कथन । समाप्त होता देख अर्जुन । अपने मनमें होता खिन्न । जिस समय ॥ ७६ ॥ वैसे आत्म-तत्वमें निश्चित । बन गया था उसका मत । श्रीहरिका न करना बात । न भाया उसे ॥ ७७ ॥ बछडा होने पर भी तृप्त । गाय रहती पास सतत । अनन्य प्रीतकी यह रीत । चलती आयी है ॥ ७८ ॥ बिन कारण भी उनका बोलना । देख कर भी फिर फिर देखना । प्रिय-वस्तुके भोगसे होता दूना । भोग-भाव ॥ ७९ ॥ ऐसी है प्रेमकी यह रीति । तथा पार्थ है उसकी पूर्ति । तभी करती उसकी मति । चिंता मौनकी ॥ ८० ॥ तथा है संवादके निमित्तसे । व्यवहारकी जो वस्तु है उसे । भोगा जाता है सहज ही जैसे । दर्पण रूप ॥ ८१ ॥ फिर जब संवाद रुकता । तब यह सुख भंग होता । इसको फिर कैसे सहता । अभ्यस्त इसका ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१६

इसलिये वह संन्यास । पूछनेका करके मिस । खोलता है पर विशेष । गीता तत्वका ॥ ८३ ॥ अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है— अठारहवा अध्याय यही नहीं । समग्र एकाध्यायी गीता है यही । दुहता है जब स्वयं बछडा ही । तब कैसा अकाल ॥ ८४ ॥ संवाद रुकनेका समय आया । पुनरपि गीता प्रारंभ कराया । गुरु-शिष्यके संवादमें अशक्य क्या । होता है कब ॥ ८५ ॥ यह सब रहने दें अब । अर्जुन पूछता सुने सब । कहता यह विनय अब । सुनले देव ॥ ८६ ॥ अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ त्याग और संन्यासका अर्थ भिन्नत्व— अजी ! संन्यास और त्याग । एक ही अर्थके दो अलग । जैसे संघात और संग , है समुदायके ॥ ८७ ॥ त्याग तथा संन्याससे । त्याग ही कहना ऐसे । जान लिया है मनसे । यहां मैंने ॥ ८८ ॥ इसमें है यदि अर्थ-भेद । करें देव इसको विशद । तब कहता वह मुकुंद । ये दोनों हैं भिन्न ॥ ८९ ॥ अर्जुनने कहा कैसे संन्यासका तत्व तथा है त्यागका कहो । जानना चाहता हूं मैं कह तूं भिन्न भिन्न जो ॥ १ ॥ ७१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

वैसे तेरा जो चिंतन । त्याग संन्यास अर्जुन । एक ही ऐसा निदान । वह भी सत्य ॥ ९० ॥ इन दोनोंका एक अर्थ । त्याग कहलाता निश्चित । भेदका कारण जो पार्थ । रहता ही है ॥ ९१ ॥ तजना कर्मको जो मूलता । वह है संन्यास कहलाता । तथा कर्म-फल जो तजता । वह है त्याग ॥ ९२ ॥ तब है कोई कर्मका फल । तजता कोई कर्म सकल । कहता हूँ यह मैं निर्मल । सुन तू चित्त देकर ॥ ९३ ॥ जैसे वनमें या पर्वत पर । वृक्ष उगते सहज अपार । वैसे उद्यान खेत धनुर्धर । नहीं उगते ॥ ९४ ॥ घास उगता यदि नहीं भी बोते । वैसे कभी धानादि नहीं उगते उसमें प्रयत्न करने पडते । उसी भांति ॥ ९५ ॥ या अंगांग सहज होते । भूषण बनाने पडते । नदी नाले सहज होते । कूए नहीं ॥ ९६ ॥ वैसे जो नित्य नैमित्तिक । कर्म होते हैं स्वाभाविक । किंतु नहीं होते कामिक । निरिच्छासे ॥ ९७ ॥ भगवान उवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ संन्यासकी परिभाषा काम्य-कर्मका त्याग— कामनाओंके समुदाय । उभारते हैं धनंजय । अश्वमेधादि स-समय । काम्य-कर्म ॥ ९८ ॥ श्रीभगवानने कहा त्यजना काम्य-कर्मोंको ज्ञानी संन्यास जानते । कहते सब कर्मोंके फलका त्याग त्याग है ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१८

कूप सरोवर आराम । अग्रहारादि महाप्राम । व्रत समारोहादि कर्म । अन्य अनेक ॥ ९९ ॥ ऐसे इष्ट-पूर्तिके जो सकल । कामना होती है जिसका मूल । भोगना पड़ता इसका फल । बंधकर ही ॥ १०० ॥ करते हैं सब देह-धारण । भोगने पड़ते जनन-मरण । इसको अ-स्वीकारना अर्जुन । असंभव जैसे ॥ १ ॥ अथवा ललाट लिखित जैसे । कभी नहीं मिटाया जाता वैसे । तथा काला गोरापन धोनेसे । मिटता नहीं ॥ २ ॥ वैसे काम्य-कर्म फल पार्थ । भोगना पड़ता है निश्चित । धरना दे बैठता है नित । ऋणदाता समान ॥ ३ ॥ या कामना नहीं करते । सहज रूपमें कर्म होते । रणभूमिमें बाण लगते । न लड़ते भी जैसे ॥ ४ ॥ अजानपनसे गूड़ खाता । फिर भी वह मीठा लगता । राख मानकर पैर देता । जलाती आग ॥ ५ ॥ काम्य-कर्ममें जो यह एक । सामर्थ्य होता है स्वाभाविक । इसीलिये मुमुक्षुको देख । नहीं चाहना उसे ॥ ६ ॥ वास्तवमें पार्थ ऐसे । काम्य कर्म होता उसे । तज देना विष जैसे । उगलकर ॥ ७ ॥ देख कर फिर यह त्याग । संन्यास कहता है सारा जग । तथा देखता जो अंतरंग । सर्वदृष्टा ॥ ८ ॥ इस काम्य-कर्मको तजना । कामनाको जैसे उखाडना । धन-त्याग कर मिटा देना । भयको जैसे ॥ ९ ॥ नित्य-नैमित्तिक कर्मका विवेचन— चंद्र-सूर्यके जो ग्रहण । बनाते पर्वणी अर्जुन । या माता-पिताका मरण । निश्चित दिवस ॥ ११० ॥ ७१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

अथवा अतिथि जब आता । तब जो जो करना पडता । ऐसे कर्मको जानना पार्थ । नैमित्तिक कर्म ॥ ११ ॥ वर्षासे क्षुब्ध होता गगन । वसंतमें खिलता है वन । देहको शृंगारता यौवन । जिस भांति ॥ १२ ॥ या सोमकांत सोम स्रवता । सूर्यसे है कमल खिलता । मूलमें जो था वही विकसता । जैसे यहां ॥ १३ ॥ वैसे नित्यका जो होता कर्म । वही नैमित्तिक यह नियम । जब वह दृढ-सा होता नाम । नैमित्तिक ॥ १४ ॥ तथा सायं प्रात और मध्यान्ह । करना होता जो प्रतिदिन । जैसी दृष्टि होती है लोचन-। को नहीं भारी ॥ १५ ॥ नहीं आती है जिस भांति गति । चरणोंमें वह सहज होती । अथवा दीपमें होती है दीप्ति । पांडुकुमार ॥ १६ ॥ बिन पुटके जैसे चंदन । सुगंध देता है निशिदिन । अधिकारका वैसे अर्जुन । वही है रूप ॥ १७ ॥ नित्य-कर्म ऐसे है जन । बोलते हैं वह तू जान । नित्य-नैमित्तिक अर्जुन । दिखाये ऐसे ॥ १८ ॥ यही है नित्य नैमित्तिक । करना है जो आवश्यक । इसीलिये कहते देख । निष्फल इसको ॥ १९ ॥ किंतु जैसे भोजनमें सतत । भूख मिटकर होता तृप्त । वैसे नित्य-नैमित्तिकका पार्थ । अंगभूत है फल ॥ १२० ॥ हीन कस सोना आगमें पड़ता । हीनता तज कर तेज चढ़ता । इन कर्मोंका वैसा ही फल होता । जानना यहां ॥ २१ ॥ इससे दोष सब मिटते । स्वाधिकार सतत बढ़ते । तथा सद्गति ओर बढ़ते । अहर्निश ॥ २२ ॥ इतना यह सब रसाल । नित्य-नैमित्तिकका है फल । किंतु तजते मूलका बल । वैसे तजना इसे ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७२०

त्यागवृत्तिका रहस्य, संन्यास और त्यागका फल— वन सारा खिल उठता । आम्र-वृक्ष भी महकता । न छूकर ही छोड़ जाता । वसंत जैसे ॥ २४ ॥ वैसे न कर कर्म-सीमा उल्लंघन । सदा कर नित्य-नैमित्तिकाचरण । तजना उसकी फल-आशा संपूर्ण । उच्छिष्ट जैसे ॥ २५ ॥ कर्म-फलका जो यही त्याग । ज्ञानियोंसे कहलाता त्याग । वैसे संन्यास और त्याग । कहा है तुझसे ॥ २६ ॥ जब यह संन्यास संभवता । काम्य-कर्म नहीं बांध सकता । निषिद्ध स्वभावसे छूट जाता । जो है निषिद्ध ॥ २७ ॥ तथा जो नित्यादिक होता । फल-त्यागसे है नाशता । जैसे अवयवोंका होता । सिर काटनेसे ॥ २८ ॥ फल पाकसे सस्य सूखता । वैसे सब कर्म है छूटता । आपसे आप खोजता आता । आत्म-ज्ञान ॥ २९ ॥ इस भांति यह दो अर्जुन । त्याग संन्यासका आचरण । देते हैं हृदय-सिंहासन । आत्म ज्ञानको ॥ १३० ॥ कर्म-त्यागकी यह कुशलता । छूट कर कर्मका त्याग जब होता । उस त्यागसे त्यागी है फंसता । जालमें अधिक ॥ ३१ ॥ नहीं करके रोगका निदान । औषध दिया विष होता जान । भूखके समय न खाया अन्न । ने मारती क्या भूख ॥ ३२ ॥ त्याग करना जहां नहीं उचित । वहां त्याग करना अनुपयुक्त । तथा जिसका त्यागना है उचित । नहीं करना लोभ ॥ ३३ ॥ त्यागका यह मर्म भूलकर । बना लेते हैं त्यागका भी भार । नहीं देखते वहां धनुर्धर । कभी वीतराग ॥ ३४ ॥ (85) ७२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग