भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 786

फिर पाते निज-बोधसे तत्काल । आत्म-रूप हरि-दर्शनका फल । ऐसे मोक्ष प्रासादमें है सकल । पाते हैं प्रसाद ॥ ४७ ॥ जैसे समर्थोंका पंक्ति भोजन । देता सबको एकसा पकवान । श्रवण पठन अर्थ-चिंतन । मोक्ष देता इसका ॥ ४८ ॥ गीता यह ऐसा वैष्णव-प्रासाद । अठारहवा कलश है विशद । मैंने कहा है जानेका यह भेद । इस स्थान पे ॥ ४९ ॥ सत्रहवे और अठारहवे अध्यायका संबंध— समाप्त होता है सत्रहवां अध्याय । वहां होता कैसे अठारहवां उदय कहूंगा यह प्रत्यक्ष-सा दृश्य । आंखमें दीखे वैसे ॥ ५० ॥ न तोडके दोनों आकार । बनाया है एक शरीर । है अर्धनारी नटेश्वर- । रूपमें जैसे ॥ ५१ ॥ या गंगा-यमुनाका उदक । प्रवाहमें भिन्न है जो देख । तथा पानी रूपसे एक । दीखता सदैव ॥ ५२ ॥ अथवा शुक्ल-पक्षमें जैसे । नाना चंद्रकला दीखती वैसे । पूर्णमासीका पूर्ण चंद्र जैसे । दीखता एक ॥ ५३ ॥ जैसे भिन्न होनेसे सब पद । श्लोकके होते हैं श्लोकावछेद । अध्यायके होते अध्याय भेद । इसी भांति ॥ ५४ ॥ किंतु कहते हैं एक ही प्रमेय । मिलकर ये अष्टादश अध्याय । नाना रत्नोंको पिरोती साभिप्राय । जैसे एकही डोरी ॥ ५५ ॥ अनेक मोतियां मिलकर । होता जैसा एकावली हार । किंतु शोभा दीखती सुंदर । एकही अखंड ॥ ५६ ॥ गिन सकते हैं वृक्षके सभी फूल । सौरभपे उंगली न पडे सरल । अध्यायोंमें श्लोक हैं वैसे ही अचल । जानना यहां ॥ ५७ ॥ यहां है जो सात शत श्लोक । अष्टादश अध्यायमें लेख । किंतु देव बोलता है एक । दूसरा नहीं ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१४