ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा मैने भी यह तजकर । नहीं किया है ग्रंथका बिस्तार । यहांपे भी कहता सविस्तर । निरूपणमें एक ॥ ५९ ॥ जहां सत्रहका अध्याय । कहते अंतके समय । कहता देव साभिप्राय । इस प्रकार ॥ ६० ॥ ब्रह्म नाममें श्रद्धा रखकर । किये जाते जितने व्यवहार । होते वह सब व्यर्थ आखर । निश्चित जान ॥ ६१ ॥ सुनकर यह श्रीहरिका बोल । डुलता है मनमें पार्थ निर्मल । कहता कर्म-निष्ठोंका है सकल । बना निम्न रूप ॥ ६२ ॥ अज्ञानसे अंध जो कर्म-जड़ । ईशको न देख सकता मूढ़ । उसके नाम श्रद्धादि जो गूढ़ । जानेगा कैसे ॥ ६३ ॥ तथा रज और तमोगुण । नहीं तजता अंतःकरण । तब होती है जो श्रद्धा क्षीण । जुडती कैसे ब्रह्मसे ॥ ६४ ॥ फिर शस्त्र-नोकसे गले लगना । तथा खडी डोरीपे दौड़ते जाना । अथवा मानो नागिनसे खेलना । होंगे कम धातुक ॥ ६५ ॥ कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ? अठारहवेका सूत्र— ऐसे कर्म अति कठिन । देते हैं पुनः पुनः जनन । इस भांति कुयोग-पूर्ण । होते हैं जो ॥ ६६ ॥ होता यदि कर्म सांग संपूर्ण । बनता है ज्ञानके ही समान । नहीं तो देता नरक महान । यही कर्म ॥ ६७ ॥ कर्ममें हैं इस प्रकार । आते हैं दोष बार बार । तब कहां मोक्षका द्वार । खुलेगा कर्मठको ॥ ६८ ॥ मिटाना है यदि कर्म-संग । करके उसका पूर्ण त्याग । स्वीकार करना जो अव्यंग । संन्यास यहां ॥ ६९ ॥ कर्म-बाधाकी जो कहीं । भयकी बातही नहीं । वह आत्म-ज्ञान यहीं । होता हस्तगत ॥ ७० ॥ ७१५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग