ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानका आवाहन-मंत्र । ज्ञान फलनेका सु-क्षेत्र । तथा ज्ञानाकर्षक-सूत्र । तंतु ही जो ॥ ७१ ॥ यह दोनों संन्यास और त्याग । आचरनेसे छूटता जग । तब इस बातमें हो सजग । पूछना स्पष्ट ॥ ७२ ॥ ऐसे विचार कर अर्जुन । त्याग संन्यासका पक्व ज्ञान । जान लेनेमें करता प्रश्न । इस स्थानपे ॥ ७३ ॥ उसके उत्तरमें श्रीकृष्ण । करता है जो यहां कथन । उससे व्यक्त हुवा संपूर्ण । अष्टादशाध्याय ॥ ७४ ॥ एवं यहां ले जन्य-जनक भाव । होता अध्यायसे अध्याय प्रसव । अब प्रश्न किया वह सावयव । सुनलें सब ॥ ७५ ॥ कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन— वहां जो श्रीकृष्णका कथन । समाप्त होता देख अर्जुन । अपने मनमें होता खिन्न । जिस समय ॥ ७६ ॥ वैसे आत्म-तत्वमें निश्चित । बन गया था उसका मत । श्रीहरिका न करना बात । न भाया उसे ॥ ७७ ॥ बछडा होने पर भी तृप्त । गाय रहती पास सतत । अनन्य प्रीतकी यह रीत । चलती आयी है ॥ ७८ ॥ बिन कारण भी उनका बोलना । देख कर भी फिर फिर देखना । प्रिय-वस्तुके भोगसे होता दूना । भोग-भाव ॥ ७९ ॥ ऐसी है प्रेमकी यह रीति । तथा पार्थ है उसकी पूर्ति । तभी करती उसकी मति । चिंता मौनकी ॥ ८० ॥ तथा है संवादके निमित्तसे । व्यवहारकी जो वस्तु है उसे । भोगा जाता है सहज ही जैसे । दर्पण रूप ॥ ८१ ॥ फिर जब संवाद रुकता । तब यह सुख भंग होता । इसको फिर कैसे सहता । अभ्यस्त इसका ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१६