भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इसलिये वह संन्यास । पूछनेका करके मिस । खोलता है पर विशेष । गीता तत्वका ॥ ८३ ॥ अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है— अठारहवा अध्याय यही नहीं । समग्र एकाध्यायी गीता है यही । दुहता है जब स्वयं बछडा ही । तब कैसा अकाल ॥ ८४ ॥ संवाद रुकनेका समय आया । पुनरपि गीता प्रारंभ कराया । गुरु-शिष्यके संवादमें अशक्य क्या । होता है कब ॥ ८५ ॥ यह सब रहने दें अब । अर्जुन पूछता सुने सब । कहता यह विनय अब । सुनले देव ॥ ८६ ॥ अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ त्याग और संन्यासका अर्थ भिन्नत्व— अजी ! संन्यास और त्याग । एक ही अर्थके दो अलग । जैसे संघात और संग , है समुदायके ॥ ८७ ॥ त्याग तथा संन्याससे । त्याग ही कहना ऐसे । जान लिया है मनसे । यहां मैंने ॥ ८८ ॥ इसमें है यदि अर्थ-भेद । करें देव इसको विशद । तब कहता वह मुकुंद । ये दोनों हैं भिन्न ॥ ८९ ॥ अर्जुनने कहा कैसे संन्यासका तत्व तथा है त्यागका कहो । जानना चाहता हूं मैं कह तूं भिन्न भिन्न जो ॥ १ ॥ ७१७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग