ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे तेरा जो चिंतन । त्याग संन्यास अर्जुन । एक ही ऐसा निदान । वह भी सत्य ॥ ९० ॥ इन दोनोंका एक अर्थ । त्याग कहलाता निश्चित । भेदका कारण जो पार्थ । रहता ही है ॥ ९१ ॥ तजना कर्मको जो मूलता । वह है संन्यास कहलाता । तथा कर्म-फल जो तजता । वह है त्याग ॥ ९२ ॥ तब है कोई कर्मका फल । तजता कोई कर्म सकल । कहता हूँ यह मैं निर्मल । सुन तू चित्त देकर ॥ ९३ ॥ जैसे वनमें या पर्वत पर । वृक्ष उगते सहज अपार । वैसे उद्यान खेत धनुर्धर । नहीं उगते ॥ ९४ ॥ घास उगता यदि नहीं भी बोते । वैसे कभी धानादि नहीं उगते उसमें प्रयत्न करने पडते । उसी भांति ॥ ९५ ॥ या अंगांग सहज होते । भूषण बनाने पडते । नदी नाले सहज होते । कूए नहीं ॥ ९६ ॥ वैसे जो नित्य नैमित्तिक । कर्म होते हैं स्वाभाविक । किंतु नहीं होते कामिक । निरिच्छासे ॥ ९७ ॥ भगवान उवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ संन्यासकी परिभाषा काम्य-कर्मका त्याग— कामनाओंके समुदाय । उभारते हैं धनंजय । अश्वमेधादि स-समय । काम्य-कर्म ॥ ९८ ॥ श्रीभगवानने कहा त्यजना काम्य-कर्मोंको ज्ञानी संन्यास जानते । कहते सब कर्मोंके फलका त्याग त्याग है ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ७१८