भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कूप सरोवर आराम । अग्रहारादि महाप्राम । व्रत समारोहादि कर्म । अन्य अनेक ॥ ९९ ॥ ऐसे इष्ट-पूर्तिके जो सकल । कामना होती है जिसका मूल । भोगना पड़ता इसका फल । बंधकर ही ॥ १०० ॥ करते हैं सब देह-धारण । भोगने पड़ते जनन-मरण । इसको अ-स्वीकारना अर्जुन । असंभव जैसे ॥ १ ॥ अथवा ललाट लिखित जैसे । कभी नहीं मिटाया जाता वैसे । तथा काला गोरापन धोनेसे । मिटता नहीं ॥ २ ॥ वैसे काम्य-कर्म फल पार्थ । भोगना पड़ता है निश्चित । धरना दे बैठता है नित । ऋणदाता समान ॥ ३ ॥ या कामना नहीं करते । सहज रूपमें कर्म होते । रणभूमिमें बाण लगते । न लड़ते भी जैसे ॥ ४ ॥ अजानपनसे गूड़ खाता । फिर भी वह मीठा लगता । राख मानकर पैर देता । जलाती आग ॥ ५ ॥ काम्य-कर्ममें जो यह एक । सामर्थ्य होता है स्वाभाविक । इसीलिये मुमुक्षुको देख । नहीं चाहना उसे ॥ ६ ॥ वास्तवमें पार्थ ऐसे । काम्य कर्म होता उसे । तज देना विष जैसे । उगलकर ॥ ७ ॥ देख कर फिर यह त्याग । संन्यास कहता है सारा जग । तथा देखता जो अंतरंग । सर्वदृष्टा ॥ ८ ॥ इस काम्य-कर्मको तजना । कामनाको जैसे उखाडना । धन-त्याग कर मिटा देना । भयको जैसे ॥ ९ ॥ नित्य-नैमित्तिक कर्मका विवेचन— चंद्र-सूर्यके जो ग्रहण । बनाते पर्वणी अर्जुन । या माता-पिताका मरण । निश्चित दिवस ॥ ११० ॥ ७१९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

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