ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथवा अतिथि जब आता । तब जो जो करना पडता । ऐसे कर्मको जानना पार्थ । नैमित्तिक कर्म ॥ ११ ॥ वर्षासे क्षुब्ध होता गगन । वसंतमें खिलता है वन । देहको शृंगारता यौवन । जिस भांति ॥ १२ ॥ या सोमकांत सोम स्रवता । सूर्यसे है कमल खिलता । मूलमें जो था वही विकसता । जैसे यहां ॥ १३ ॥ वैसे नित्यका जो होता कर्म । वही नैमित्तिक यह नियम । जब वह दृढ-सा होता नाम । नैमित्तिक ॥ १४ ॥ तथा सायं प्रात और मध्यान्ह । करना होता जो प्रतिदिन । जैसी दृष्टि होती है लोचन-। को नहीं भारी ॥ १५ ॥ नहीं आती है जिस भांति गति । चरणोंमें वह सहज होती । अथवा दीपमें होती है दीप्ति । पांडुकुमार ॥ १६ ॥ बिन पुटके जैसे चंदन । सुगंध देता है निशिदिन । अधिकारका वैसे अर्जुन । वही है रूप ॥ १७ ॥ नित्य-कर्म ऐसे है जन । बोलते हैं वह तू जान । नित्य-नैमित्तिक अर्जुन । दिखाये ऐसे ॥ १८ ॥ यही है नित्य नैमित्तिक । करना है जो आवश्यक । इसीलिये कहते देख । निष्फल इसको ॥ १९ ॥ किंतु जैसे भोजनमें सतत । भूख मिटकर होता तृप्त । वैसे नित्य-नैमित्तिकका पार्थ । अंगभूत है फल ॥ १२० ॥ हीन कस सोना आगमें पड़ता । हीनता तज कर तेज चढ़ता । इन कर्मोंका वैसा ही फल होता । जानना यहां ॥ २१ ॥ इससे दोष सब मिटते । स्वाधिकार सतत बढ़ते । तथा सद्गति ओर बढ़ते । अहर्निश ॥ २२ ॥ इतना यह सब रसाल । नित्य-नैमित्तिकका है फल । किंतु तजते मूलका बल । वैसे तजना इसे ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७२०