भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 793, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 793

त्यागवृत्तिका रहस्य, संन्यास और त्यागका फल— वन सारा खिल उठता । आम्र-वृक्ष भी महकता । न छूकर ही छोड़ जाता । वसंत जैसे ॥ २४ ॥ वैसे न कर कर्म-सीमा उल्लंघन । सदा कर नित्य-नैमित्तिकाचरण । तजना उसकी फल-आशा संपूर्ण । उच्छिष्ट जैसे ॥ २५ ॥ कर्म-फलका जो यही त्याग । ज्ञानियोंसे कहलाता त्याग । वैसे संन्यास और त्याग । कहा है तुझसे ॥ २६ ॥ जब यह संन्यास संभवता । काम्य-कर्म नहीं बांध सकता । निषिद्ध स्वभावसे छूट जाता । जो है निषिद्ध ॥ २७ ॥ तथा जो नित्यादिक होता । फल-त्यागसे है नाशता । जैसे अवयवोंका होता । सिर काटनेसे ॥ २८ ॥ फल पाकसे सस्य सूखता । वैसे सब कर्म है छूटता । आपसे आप खोजता आता । आत्म-ज्ञान ॥ २९ ॥ इस भांति यह दो अर्जुन । त्याग संन्यासका आचरण । देते हैं हृदय-सिंहासन । आत्म ज्ञानको ॥ १३० ॥ कर्म-त्यागकी यह कुशलता । छूट कर कर्मका त्याग जब होता । उस त्यागसे त्यागी है फंसता । जालमें अधिक ॥ ३१ ॥ नहीं करके रोगका निदान । औषध दिया विष होता जान । भूखके समय न खाया अन्न । ने मारती क्या भूख ॥ ३२ ॥ त्याग करना जहां नहीं उचित । वहां त्याग करना अनुपयुक्त । तथा जिसका त्यागना है उचित । नहीं करना लोभ ॥ ३३ ॥ त्यागका यह मर्म भूलकर । बना लेते हैं त्यागका भी भार । नहीं देखते वहां धनुर्धर । कभी वीतराग ॥ ३४ ॥ (85) ७२१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग