ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 783, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंजय जय देव श्रीगुरु । अकल्पनाख्य कल्पतरु । स्वसंविद्रुमबीजप्ररु । भूमिरूप ॥ १० ॥ निर्विशेष तेरा स्तवन कैसे करूं ?— यह क्या एकेक कर ऐसे । अनेक परिभाषासे कैसे । स्तोत्र करूं तव उद्देश्यसे । निर्विशेष ॥ ११ ॥ जिन विशेषणसे करना वर्णन । वह दृश्य-रूप तेरा न होता जान । लज्जित होता हूं करनेमें स्तवन । तेरा मैं श्रीगुरु ॥ १२ ॥ किंतु जो मर्यादाका सागर । ऐसी उसकी ख्याति सादर । किंतु न देखता सुधाकर । हुवा उदय ॥ १३ ॥ निज-निर्झरसे वह सोमकांत । चंद्रको अर्घ्य न देता यदि रात । तब उससे दिलाता निशा-नाथ । सुनो देव ॥ १४ ॥ न जाने कैसे वसंत आता । सहसा खिलते वृक्ष-लता । किंतु आप न रोक सकता । खिलता वृक्ष ॥ १५ ॥ पद्मिनी पाकर रवि-किरण । सिकुडना जानती कहां कौन । या जल-स्पर्श होते ही लवण । भूलता अंग ॥ १६ ॥ वैसे मैं करता तेरा स्मरण । होता मैं मेरा यह विस्मरण । डकार रोक न सकता जान । तृप्त जैसे ॥ १७ ॥ तूने मुझे किया ही है ऐसे । मेरा मैं-पन मिटा देनेसे । स्तवनार्थ पागल-पनसे । नाचती वाचा ॥ १८ ॥ अथवा मैं वैसे ही सचेतन । रहके करूंगा तेरा स्तवन । जिससे गुण-गुणीकी तुलना । होगी मुझसे ॥ १९ ॥ तथा तू है एकरस अखंड । कैसे करें गुण-गुणीका खंड । मोति भला क्या तोडकर जोड़ । या समूचा वैसेही ॥ २० ॥ और तू है माता तथा पिता । इससे स्तवन नहीं होता । लगती उपाधिकी भृष्टता । पुत्रत्वकी मात्र ॥ २१ ॥ ७११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग