ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग चित्सूर्यरूपी श्रीगुरु वंदन— जय जय देव निर्मल । निज-जनाखिल मंगल । जन्म-जरा-जलद-जाळ । प्रभंजन ॥ १ ॥ जय जय देव प्रबल । विदलित मंगल कुल । निगमागमद्रुम-फल । फलप्रद ॥ २ ॥ जय जय देव सकल । विगत विषयवत्सल । कलितकालकौतूहल । कालातीत ॥ ३ ॥ जय जय दैव निष्कल । स्फुरदमंदानंद बहुल । नित्य निरस्ताखिलमल । मूलभूत ॥ ४ ॥ जय जय देव स्वप्रभ । जगदंबुगव्हर्गर्भ नभ । भुवनोद्भावारंभ-स्तंभ । भवध्वंस ॥ ५ ॥ जय जय देव निश्चल । चिलित-चित-पान तुंदिल । जगदुन्मीलनाविरल- । केलिप्रिय ॥ ६ ॥ जय जय देव विशुद्ध । विदुदयोद्यान-द्विरद । शम-दम-मदन-मद-भेद । दयार्णव ॥ ७ ॥ जय जय देवैकरूप । अतिकृत-कंदर्प-सर्प-दर्प । भक्त-भाव-भुवन-दीप । तापावह ॥ ८ ॥ जय जय देव अद्वितीय । परिणतोपरमैकप्रिय । निज-जन-नित-भजनीय । मायागम्य ॥ ९ ॥