ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस सत्तांका रूप संतत । रहता है स्थल-कालातीत । तथा होता है जो अखंडित । अपने आपमें ॥ ८१ ॥ जितना जो है यह दीखता । असत् यह वह नहीं होता । रूप जो यह जानता पाता । उसका आश्रय ॥ ८२ ॥ इससे वह् प्रशस्त कर्म । हुवा है जो सर्वात्मक ब्रह्म । कर देखना उससे सम । ऐक्य बोधसे ॥ ८३ ॥ ओंकार तथा जो तत्कार । दिखाता कर्म ब्रह्माकार । होना उसे निगलकर । केवल ब्रह्म ॥ ८४ ॥ ऐसा यह अंतरंग । सत् शब्दका विनियोग । कहता यह श्रीरंग । मैं नहीं कहता ॥ ८५ ॥ यदि कहता मैं, मैं यह कहता । श्रीरंगमें द्वैतकी आती हीनता । इसीलिये यह वचन है कहता । श्रीहरिका ही ॥ ८६ ॥ सत् शब्दका और एक अर्थ— अब और ही एक प्रकार । सत् शब्दका सुन तू धनुर्धर । करता सात्विक कर्म पर । उपकार जो ॥ ८७ ॥ सत्कर्म चलते हैं सुंदर । अपने अधिकारानुसार । जब कोई अंग धनुर्धर । होता हीन कस ॥ ८८ ॥ एक अवयवकी दुर्बलता । शरीर व्यापारको ही रोकता । या किसी अंगसे है रुक जाता । रथका वेग ॥ ८९ ॥ वैसे ही एक गुणके बिन । संतमें आता असंतपन । तब सत्कर्म बनाता है जान । असत्कर्म ॥ ३९० ॥ तब ओंकार तथा तत्कार । करते हैं कर्मको सुंदर । वैसे ही उसका जीर्णोद्धार । करता सत् शब्द ॥ ९१ ॥ कर्मके असत्को यह मिटाता । उसमें सद्भाव रूढ करता । निज सत्त्वकी प्रौढ़ता बढ़ाता । यह सत् शब्द ॥ ९२ ॥ दिव्यौषधिसे रोगीको जैसे । असहायको सहायतासे । कर्म-व्यंगमें सत् शब्द वैसे । करता पूर्ण ॥ ९३ ॥ (84) ७०५ श्रद्धा-निरूपण-योग