भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अथवा हो कोई प्रमाद । कर्म छोडकर मर्यादा । भूलसे राहपे निषिद्ध । राहपे वहां ॥ ९४ ॥ चलते हुए भी मार्ग भूलता । तज्ञोंकी दृष्टिमें वह आता । व्यवहारमें क्या नहीं होता । कह तू मुझे ॥ ९५ ॥ इसीलिये ऐसे जो कर्म होते । अविचारसे सीमाको लांघते । असाधुता दुर्नाम पहुंचते । उस समय ॥ ९६ ॥ वहां पर यह सत् शब्द । उन दोनोंसे है प्रबुद्ध । नियोजित साधुता-सिद्ध । उस कर्मका ॥ ९७ ॥ जैसे लोह पारसकी दृष्टि । नाला और गंगाकी भेटी । अथवा मृत पर हो वृष्टि । अमृतकी जैसे ॥ ९८ ॥ असाधु कर्ममें अर्जुन । सत् शब्द प्रयोग तू जान । रहता है जो बड़प्पन । इस शब्दका ॥ ९९ ॥ जान कर यह सब मर्म । विचार करेगा यह नाम । यही है केवल पर-ब्रह्म । अनुभवेगा तू ॥ ४०० ॥ यह नाम शुद्ध पर-ब्रह्म है— देख तू यह ओं' तत् सत् ऐसे । वहां पहुंचते बोलनेसे । सब प्रकाशता है जहांसे । दृश्य विश्व यह ॥ १ ॥ वह है पूर्ण निर्धर्म । शुद्ध ऐसा पर-ब्रह्म । यह अंतरंग नाम । करता व्यक्त ॥ २ ॥ आश्रय आकाशका जैसा । केवल आकाश है वैसा । यह नाम सबमें वैसा । है अभेद ॥ ३ ॥ आकाशमें जो उदय होता । सूर्य ही सबको प्रकाशता । वैसे है नाम ही प्रकाशता । नामीको यहां ॥ ४ ॥ तभी तीन अक्षरोंका नाम । नाम नहीं है केवल ब्रह्म । यह जान कर जो जो कर्म । किया जाता है ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०६