ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे अकर्ता मान कर्म करता । कर्ता मान जो फलाशा न धरता उन दोनोंको बांध न सकता । केवल कर्म ॥ ३६ ॥ पकता पेड जो राह पर । उसके फलकी आशा कर । सदा कर्मका भी धनुर्धर । फल बांधता है ॥ ३७ ॥ किंतु करके फलाशा तजता । जगतके कार्यमें न घुसता । त्रिविध विश्व यह जो पूर्णता । कर्म फल है ॥ ३८ ॥ देव मानव और स्थावर । इसका नाम जगदंबर । ऐसे ही हैं ये तीन प्रकार । कर्म फलके ॥ ३९ ॥ एक है वही अनिष्ट । एक है जो केवल इष्ट । तथा एक है जो इष्टानिष्ट । त्रिविध ऐसे ॥ २४० ॥ किंतु बुद्धि बन विषयासक्त । स्वैराचारमें होकर अभ्यस्त । निषिद्ध कर्ममें होते प्रवृत्त । दुर्व्यवहारमें ॥ ४१ ॥ वहां है कृमिकीट लोष्ट । देह पाते हैं जो निकृष्ट । उसका नाम है अनिष्ट । कर्मका फल ॥ ४२ ॥ या स्वधर्मको मान देकर । अपने अधिकारानुसार । सुकृत करते धनुर्धर । वेदाज्ञासे ॥ ४३ ॥ देवोंके वे इंद्रादिक । देह पाते हैं अति नेक । कर्म-फल इष्टमें देख । उसकी प्रसिद्धी ॥ ४४ ॥ किंतु खटा मीठा मिलकर । होता है विशिष्ट रसांतर । स्वादमें दोनोंसे रुचिकर । होता भिन्न ही ॥ ४५ ॥ रेचक ही होके योग-वश । करता है स्तंभनका दोष । वैसे सत्यासत्य समस्त । जीतता असत्य ॥ ४६ ॥ सम-भागसे है शुभाशुभ । होके खड़ा अनुष्ठान भाग । उससे जो मनुष्यत्व-लाभ । मिश्र फल है ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३२