ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस कर्म-फलसे बद्ध और मुक्तता— ऐसे इसके त्रिविध भागमें । कर्म-फल रचा जगतमें । फंसे हैं जो भोगकी आशामें । उससे वे हैं बद्ध ॥ ४८ ॥ जिव्हा-चापल्य जैसे बढ़ता । वैसे भोजन मीठा लगता । अंतमें जो फल निकलता । रोगसे मृत्यु ॥ ४९ ॥ चोर-मैत्री तब तक भली । जब न आती एकांत-स्थली । वैसे होती है वेश्या भी भली । न होता स्पर्श ॥ २५० ॥ जब तक करता कर्म शरीर । मिलता जाता सन्मान धनुर्धर । मृत्यु समयमें घिरते आकर । कर्मके फल ॥ ५१ ॥ समर्थ होता जो महाजन । द्वारपे बैठ ले जाता धन । वैसे ही कर्म-फल अर्जुन । भोगने पड़ते ॥ ५२ ॥ भुट्टेसे जैसे धान झड़ता । उसी धानसे भुट्टा लगता । फिर भुट्टेसे धान गिरता । उससे फिर भुट्टा ॥ ५३ ॥ वैसे जो भोगसे कर्म होता । उस कर्ममें भोग लगता । पैर पैरको जीतता जाता । चलनेमें जैसे ॥ ५४ ॥ नांव रुकती उतार देखकर । होता वह उसका उरला तीर । वैसे है कर्म-फलसे धनुर्धर । नहीं है मुक्ति ॥ ५५ ॥ साध्य-साधन प्रकार फिर । करता फल-भोग प्रसार । ऐसे ही उलझाता संसार । अत्यागीको ॥ ५६ ॥ चमेली पुष्पका जैसे खिलना । उसका नाम ही है सूख जाना । वैसे फलाशासे नहीं करना । किया है ऐसे ॥ ५७ ॥ बीजका धान्य ही जब खाया जाता । किसानीका काम ही है रुकता । वैसे फल-त्यागसे है मिटता । कर्मका फल ॥ ५८ ॥ तब सत्व-शुद्धिके सहायसे । गुरु-कृपामृतके तुषारोंसे । उतरता खिले हुए बोधसे । द्वैतदैन्य ॥ ५९ ॥ तब है जगदाभासके कारण । मिटता है त्रिविध फल स्फुरण । वैसे ही भोक्ता-भोग्य सहज मान । होता है अस्त ॥ २६० ॥ ७३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग