ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्याससे मूल अविद्या रहती ही नहीं— सधता ज्ञान-प्रधान ऐसा । जिसका संन्यास है वीरेशा । फल-भोगके कष्टसे जैसा । होता है मुक्त ॥ ६१ ॥ तथा संन्यासमें है एक बात । आत्म-रूपमें दृष्टि होती रत । वहां कर्म दूसरा ऐसे पार्थ । दीखेगा कैसे ॥ ६२ ॥ ढह जाती है सब सारी दीवार । मिटते चित्र माटीमें मिलकर वैसे ही नहीं रहता है अंधार । उदय होते ही ॥ ६३ ॥ न रही रूपकी काया जब । कहांसे दीखेगी छाया तब । कहांसे दिखेगा प्रतिबिंब । दर्पण ही नहीं ॥ ६४ ॥ जहां नहीं निद्राको ही स्थान । आयेगा वहां कहांसे स्वप्न । फिर कैसे कहे कहो कौन । स्वप्न मिथ्या या सत्य ॥ ६५ ॥ उसी भांति संन्यासमें यहां । मूल अविद्या न रही जहां । उसका व्यापार रहा कहां । तथा करे कौन ॥ ६६ ॥ तभी इस संन्यासमें एक । कर्मकी बात कैसी है देख । किंतु अविद्या देहमें एक । रहती है जो ॥ ६७ ॥ कर्तृत्वके बल पर पार्थ । आत्मा होती शुभाशुभमें प्रवृत्त । तथा दृष्टि-भेदके स्थानपे स्थित । रहती है वह ॥ ६८ ॥ होता जैसे पूर्व पश्चिम । वैसे है आत्मा और कर्म । ऐसी भिन्नता है सुवर्म । जान तू यह ॥ ६९ ॥ अथवा नभ और बादल । तथा सूर्य और मृगजल । पृथ्वी और वायुमें निर्मल । होती है भिन्नता ॥ २७० ॥ ओढकर नदीका नीर । बैठता नदीमें पत्थर । उन दोनोंमें धनुर्धर । जानता तू भेद ॥ ७१ ॥ जलकुंभी होती जलके पास । किंतु जलसे भिन्न होती खास । कालिख रहती दीपके पास । किंतु होती क्या दीप ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३४