ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअब कैसा प्रसंग चला था । क्या बोल रहे थे हम पार्था । सब कर्मोंकी जहां भिन्नता । आत्मामें है ॥ ९६ ॥ तब कहता हरिसे अर्जुन । कहता तू सहज मेरा मन । प्रारंभ किया उचित श्रीकृष्ण । मेरी समस्याका ॥ ९७ ॥ कर्म-सिद्धिके पांच कारण— जो है सभी कर्मका बीज । कारण पंचक जो तुझ । 'करूंगा मैं तुझसे आज' । कहा था मैने ॥ ९८ ॥ तथाँ है जो कर्म कारणसे । संबंध नहीं है आत्मासे । कहा था अब तूने ऐसे । वह भी कहना ॥ ९९ ॥ तब विश्वेश्वर कहता । संतोष-चित्तसे हे पार्थ । हमसे जिद्द कर बैठता । ऐसा मिलता कौन ॥ ३०० ॥ करूंगा सरल निरूपण । कहता तब यह श्रीकृष्ण । किंतु चुकाना पडेगा ऋण । तुझे इस बातका ॥ १ ॥ तब अर्जुन कहता देव । भूल गया क्या पिछले भाव । इस बातमें रखता ठाव । मैं तू पनका ॥ २ ॥ कहता है तब श्रीकृष्ण । कहूंगा अब जो वचन । मनोयोग पूर्वक सुन । पांडुकुमार ॥ ३ ॥ यह सच है धनुर्धर । कर्म जिस पर है स्थिर । वे सब आत्मासे बाहर । कारण हैं पांच ॥ ४ ॥ इन पांचोंके ही कारण । कार्यारंभ होते हैं जान । इससे कर्ममें है जान । हेतु भी पांच ॥ ५ ॥ यहां है आत्म-तत्व उदासीन । वह ना हेतु या न उपादान । न बनता है आप संवहन । कार्य-सिद्धिका ॥ ६ ॥ शुभाशुभ अंशमें वहां जैसे । उत्पन्न हो जाते हैं कर्म ऐसे । रात और दिवस आकाशसे । बनते रहते ॥ ७ ॥ (36) ७३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग