ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतोय तेज तथा धूम । यहां वायुसे संगम । होनेसे है अभ्रागम । न जानता गमन ॥ ८ ॥ अनेक काष्ठोंसे नांव बनती । केवटसे वह चलाई जाती । वैसे ही वायुसे वह चलती । उदक है साक्षी ॥ ९ ॥ जैसे एक मृत्तिकाका पिंड । व्यय हो कर बनता भांड । जब घुमाता है एक दंड । भ्रमण चक्र ॥ ३१० ॥ यह कर्तृत्व कुलालका । वहां क्या रहा है पृथ्वीका । बिन आधारके किसीका । कह तू संबंध ॥ ११ ॥ सूर्य-उदयके साथ सदैव । सभी व्यापार चलते पांडव । इसमें सविताका क्या कर्तृत्व । रहता है कह तू ॥ १२ ॥ ऐसे पांच हेतुका मिलन । होते हैं यहां पांच कारण । उगती कर्म-लता अर्जुन । आत्मा स्वतंत्र ॥ १३ ॥ अब मैं वह सब भिन्न भिन्न । करता हूं पांचोंका विवेचन । तुला कर देख लेते हैं जान । मोतियां जैसे ॥ १४ ॥ अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥ १ कर्म-सिद्धिका कारण, देह— ऐसे हैं ये सब लक्षण । सुन तू जो कर्म कारण । देह है पहला कारण । कहता हूं मैं ॥ १५ ॥ देहको कहते हैं अधिष्ठान । कहता सुन इसका कारण । स्व-भोग सह जीवका है स्थान । यह शरीर ॥ १६ ॥ बना कर इंद्रियोंके दस हाथ । उससे श्रमकर दिवस रात । प्रकृतिसे भोग पाता है पार्थ । इस स्थानपे ॥ १७ ॥ अधिष्ठान अहंकार तथा विविध साधन । भिन्न भिन्न क्रिया पार्थ करते दैव पांचवा ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३८