ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके भोगके कारण । शरीर बिन अन्य स्थान । नहीं होनेसे अधिष्ठान । कहते शरीरको ॥ १८ ॥ यह चौबीस ही तत्वोंका । कुटुंब गृह है बस्तीका । छूटना है बंध मोक्षका । उलझन यहीं ॥ १९ ॥ अथवा जो हैं अवस्थात्रय । अधिष्ठान जान धनंजय । इसीलिये जान यह काय । कहलाता अधिष्ठान ॥ ३२० ॥ २ कर्म-सिद्धिका कारण, कर्ता=अहंकार— तथा कर्ता यह दूसरा । कर्म कारण धनुर्धर । प्रतिबिंबसा है अपार । चैतन्यका जो ॥ २१ ॥ आकाशसे बरसता है नीर । उससे जो बनता सरोवर । तथा बिंबित होता तदाकार । आकाश जैसे ॥ २२ ॥ अथवा राजा निद्रासे भरकर । स्वयं आप विस्मृतिमें डूबकर । स्वप्नमें अनुभवता धनुर्धर । दरिद्री जैसे ॥ २३ ॥ वैसे अपनेको भूलकर । चैतन्य देहाकार लेकर । अनुभवता है देहाकार । आत्मस्वरूप ॥ २४ ॥ ऐसे ही विचारोंके कारण । प्रसिद्ध है जीव ऐसा जान । बंधकर वह सह तन । संपूर्ण रूपसे ॥ २५ ॥ प्रकृति करती है जो कर्म । कहता है मैंने किया सभ्रम । वहां यह कर्ता ऐसा नाम । लेता है जीव ॥ २६ ॥ ३ कर्म-सिद्धिका कारण, विविध साधन— होती है जो एकही वैसी । दीखती है चोरी हुईसी । पलकोंमेंसे दृष्टि जैसी । चवरोंके बाल ॥ २७ ॥ यह घरमें रहता एक । दीपका वह अवलोक । गवाक्षोंके-भेदसे अनेक । दीखता जैसे ॥ २८ ॥ वैसे बुद्धिका जानना । श्रोत्रादि भेदसे नाना । बाहर इंद्रियपन । होता है व्यक्त ॥ २९ ॥ ७३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग