ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह पृथग्विध कारण । यहां जो कर्मका कारण । तीसरा है जान अर्जुन । इंद्रियां जो ॥ ३३० ॥ ४ कर्म-सिद्धिका कारण, भिन्न भिन्न क्रिया— होता है जैसे एक ही नीर । पूर्व पश्चिममें बहकर । कहलाता है पांडुकुमार । नदी नद जैसे ॥ ३१ ॥ तथा जैसे एकही पुरुष । अनुकरणसे नव रस । होता जैसे नवविध भास । उसी प्रकार ॥ ३२ ॥ प्राण वायुकी अखंड क्रिया शक्ती । अन्यान्य स्थान पर जो बिखुरती । अन्यान्य नामसे पहचानी जाती । शतरूप लेकर ॥ ३३ ॥ जब वह वाणीमें आती । तब वाक्शक्ति कहलाती । जब हाथोंमें उतरती । बनती व्यापार ॥ ३४ ॥ तथा चरणोंमें आकर । वही गति कहलाकर । उतरती है अधोद्वार । होती क्षरण ॥ ३५ ॥ नाभिकंदसे जो हृदय । करता प्रणव उदय । कहलाती है धनंजय । वह प्राण ॥ ३६ ॥ फिर है ऊर्ध्वके अर्जुन । आवागमनके कारण । कहलाता वही उदान । उसी प्रकार ॥ ३७ ॥ • अधोरंध्रसे वह बहता । अपान नामसे जाना जाता । वही जब व्यापक हो जाता । कहलाता व्यान ॥ ३८ ॥ खाया हुवा अन्नका रस । शरीर भरता सरस । नहीं छोडता है विशेष । शरीर भाग ॥ ३९ ॥ सभी व्यापार जो ऐसे । होते हैं क्रिया कर्म ऐसे । कहते समान ऐसे । धनुर्धर ॥ ३४० ॥ उबासी छींक डकार । ऐसे होते जो व्यापार । नाग कूर्मादि कृकर । भिन्न नामसे ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४०