ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवं वायुकी यह चेष्टा । एकही होती है सुभट । व्यापार भेदसे पलटा । होता है जो ॥ ४२ ॥ भिन्न भिन्न कार्यास्तव । वायुशक्ति जो पांडव । भिन्न होती है सदैव । कारण चौथा ॥ ४३ ॥ ५ कर्म-सिद्धिका कारण, दैव— ऋतुओंमें शरद सुंदर । शरदमें भी है सुधाकर । उसमें है योग धनुर्धर । पूर्णिमाका ॥ ४४ ॥ या वसंतमें भला आराम । आराममें भी प्रिय-संगम । उसमें भी होता आगम । उपचारोंका ॥ ४५ ॥ नाना कमलमें धनुर्धर । विकसन होता है सुंदर । उसमें भी होता है उभार । परागका ॥ ४६ ॥ वाचाका सौंदर्य है कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व । रसिकत्वमें है परतत्व । स्पर्श जैसे ॥ ४७ ॥ सभी वृत्तियोंका वैभव । बुद्धिही एक है पांडव । बुद्धिकी शोभा नित्य नव । सामर्थ्य इंद्रियोंका ॥ ४८ ॥ इंद्रिय मंडलका वैभव । शृंगार एक ही है पांडव । वह है जो अधिष्ठात्री दैव- । अनुकूलता ॥ ४९ ॥ तभी चक्षु आदि जो दस इंद्रिय । उन पर अनुग्रह धनंजय । सूर्यादि देवताओंका समुदाय । रहता है सदा ॥ ३५० ॥ ऐसा जो देव-वृंद अर्जुन । कहा पांचवा कर्म कारण । जानना यहां ऐसा श्रीकृष्ण । कहता है जो ॥ ५१ ॥ ऐसी जो सब कर्म खान । उसकी उत्पत्तिका कारण । बुद्धिगम्य हो ऐसा अर्जुन । कहा है यहां ॥ ५२ ॥ अब जिन हेतुके कारण । बढ़ती है जो कर्मकी खान । उसका सभी हेतु अर्जुन । कहूंगा मैं पांच ॥ ५३ ॥ ७४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग