भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 814, कुल 1172 में से

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शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥ विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य होता है— आता जब जब वसंत । होता नव-पल्लवका हेत । नव-पल्लव पुष्प हेत । पुष्प देता है फल ॥ ५४ ॥ या वर्षाको लाते मेघ । मेघसे वृष्टि प्रसंग । वृष्टिसे मिलते भोग । सस्य-सुखके ॥ ५५ ॥ या सूर्य अरुणको प्रसवता । अरुणसे सूर्य उदय होता । सूर्यसे सब विश्व उजलता । दिवस रूप ॥ ५६ ॥ वैसे ही है हेतु जो मन । संकल्प-भावका अर्जुन । संकल्प है वाचाका जान । जलाता दीप ॥ ५७ ॥ फिर वह वाचाकी मशाल । दिखाती कर्म-मार्ग सकल । सो खोलता कर्ता टंकसाल । कर्तृत्वकी तब ॥ ५८ ॥ शरीरादि यहां समुदाय । शरीर हेतु है धनंजय । होता है जैसे लोहका कार्य । लोहसे ही ॥ ५९ ॥ अथवा तंतुओंका ताना जैसे । मिलकर तंतुओंके बानेसे । कहलाता जब कपडा ऐसे । केवल हैं तंतु ॥ ३६० ॥ वैसे ही है मानवके देहका । रचता हेतु कर्म-मनादिका । रत्नसे ही बनता है रत्नका । उपहार जैसे ॥ ६१ ॥ यहां जो शरीरादि कारण । हेतु कैसे होता यह ज्ञान । जानना चाहता तो अर्जुन । सुन तू अब ॥ ६२ ॥ कारण और हेतुके मिलनसे कर्म-निर्माण होता है— अथवा सूर्य प्रकाशके जैसा । हेतु कारण सूर्य ही है वैसा । या ईखका कांड है ईख जैसा । बढनेका कारण ॥ ६३ ॥ काया वाचा मनसे जो विश्वमें करता नर । धर्म या अधर्मका हो उसके पांच हेतु हैं ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४२

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