भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वाग्देवताका अनेक वर्णन । वाचा ही करती है ऐसे जान । अथवा वेद ही प्रतिष्ठापन । करते वेदोंका ॥ ६४ ॥ वैसे ही कर्मका शरीरादिक । कारण जानते हैं स्वाभाविक । किंतु यही हेतु नहीं है चूक । इस स्थानपे ॥ ६५ ॥ तथा देहादिक जो कारण । तथा देहादि हेतु मिलन । होनेसे सभी कर्म निर्माण । होते उसके ॥ ६६ ॥ सब जो वह शास्त्र सम्मत । मार्ग अनुसरता है पार्थ । तब न्यायसे है न्यायोचित । होता है हेतु ॥ ६७ ॥ जैसे वर्षा नीरका बडा बहाव । सहज शालि-खेतमें जाता पांडव । सोखकर होता है वह अतीव । लाभ दायक ॥ ६८ ॥ या निकला रोषसे अकस्मात । द्वारकाकी राहपे चला पार्थ । चलना उसका न होता पार्थ । थकने पर भी ॥ ६९ ॥ होनेसे हेतु कारण मिलन । होता जहां अंधा कर्म उत्पन्न । उसे मिले शास्त्रोचित नयन । होता है न्याय ॥ ३७० ॥ दूधमें आया बडा उफान । तथा वह गिर गया जान । उसे यज्ञ कहना अर्जुन । नहीं उचित ॥ ७१ ॥ वैसे शास्त्र-सम्मतिके बिन । किया हुवा नहीं अकारण । तब चुराया हुवा जो धन । दानमें गया क्या ॥ ७२ ॥ बावन वर्णपर कौन । मंत्र है कह तू अर्जुन । नहीं उच्चारता बावन । वर्णको कौन यहां ॥ ७३ ॥ किंतु मंत्रकी कुशलता । जब तक नहीं जानता । उच्चार फल नहीं पाता । उसी प्रकार ॥ ७४ ॥ कारण हेतु योगसे । होता जो अचानकसे । शास्त्रकी सो कसौटीसे । नहीं उतरता ॥ ७५ ॥ तबभी सब कर्म होता ही है । किंतु वह होना योग्य नहीं है । वह जो अन्याय ही अन्याय है । ऐसाही मानना ॥ ७६ ॥ ७४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग