भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥ आत्मा कभी कर्ता नहीं होता— एवं कर्मके हैं पांच कारण । वैसेही पांच हेतु हैं अर्जुन । उसमें कहां आत्माका दर्शन । होता है तुझको ॥ ७७ ॥ नहीं होता सूर्य जैसे रूप अर्जुन । चक्षुरूपसे कराता प्रकाशमान । वैसे ही आत्मा नहीं होता कर्म जान । कराता वह प्रकट ॥ ७८ ॥ दर्पणमें जो है जैसे देखता । दर्पण औ' प्रतिबिंब न होता । किंतु इनको है प्रकाश देता । देखकर जो ॥ ७९ ॥ अथवा अहोरात्र सविता । न होके करता पांडुसुता । वैसे आत्मा नहीं कर्म कर्ता । किंतु दिखाता है ॥ ३८० ॥ किंतु देहाहंकारके भ्रमसे । बुद्धिके देह ही मैं माननेसे । आत्म-विषयमें उसको जैसे । हुई मध्य रात्री ॥ ८१ ॥ जिसने चैतन्य ईश्वर ब्रह्म । किया हो देह ही सीमा परम । उसको आत्मा कर्ता ऐसा भ्रम । होता निश्चित ॥ ८२ ॥ किंतु आत्मा ही है कर्म-कर्ता । ऐसा भी निश्चय नहीं होता । शरीर ही मैं हूं कर्म-कर्ता । मानता सत्य ॥ ८३ ॥ आत्मा ही मैं कर्मातीत । सर्व कर्म साक्षीभूत । यह जो यथार्थ बात । न सुने कानसे ॥ ८४ ॥ इसीलिये अमाप आत्माको जहां । देहमें ही सीमित करता यहां । उलूक रातकोही दिवस जहां । मानता है वैसे ॥ ८५ ॥ जिसने आकाशका कहीं । सच्चा सूर्य देखा ही नहीं । वह गढेके बिंबकोही । मानके सूर्य ॥ ८६ ॥ वहां जो शुद्ध आत्माको कर्ता मान बसा हुवा । संस्कार हीन जो मूढ न जाने तत्त्व दुर्मति ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४४

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