ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंडबरेका उत्पन्न होना । सूर्यकी उत्पत्ती मानना । उसके नाशमें नाशना । कांपनेसे कंप ॥ ८७ ॥ अजी ! सोता जब नहीं जगता । तब स्वप्नको ही सत्य जानता । रज्जू न जान सांपसे डरता । इसमें क्या विस्मय ॥ ८८ ॥ जब है आंखोंमें ही कामला । तब चंद्र भी दीखता पीला । मृग भी नहीं क्या मृगजल । देख भ्रमते हैं ॥ ८९ ॥ शास्त्र या गुरुका नाम धनुर्धर । रखता है गांवकी सीमाके पार । लेकर वह मूर्खताका ही आधार । जीता रहता है ॥ ३९० ॥ उस देहाभ्र - दृष्टिके कारण । आत्मापे पड़ता देहावरण । अभ्रवेग चंद्रमें आरोपण । करते हैं जैसे ॥ ९१ ॥ फिर इस मान्यताके कारण । देहकी बंदिशालामें अर्जुन । कर्मकी वज्रगांठमें बंधन । भोगता आप ॥ ९२ ॥ सुग्गा जैसे नलिका पर । आप बंधित मानकर । वस्तुतः स्वतंत्र होकर । फंसता है जैसे ॥ ९३ ॥ वैसे ही आत्म-स्वरूपपर । प्रकृति-गुणोंको थोप कर । कल्पकोटि तक धनुर्धर । कर्ममें फंसता ॥ ९४ ॥ किंतु जो कर्ममें रहता । कर्म उसको नहीं छूता । वडवानल जैसे होता । समुद्रोदकमें ॥ ९५ ॥ ऐसे जो कर्ममें भी अलिप्त । रहता कर्म कर सतत । जानना उसको कैसे पार्थ । कहता हूं अब ॥ ९६ ॥ करनेसे मुक्तका विचार । खुलता अपना मुक्ति-द्वार । दीप-प्रकाशमें देखकर । पाते वस्तु जैसे ॥ ९७ ॥ जैसे जैसे पोंछते हैं दर्पण । अपना आपको होता दर्शन । या पानीमें मिलकर लवण । होता पानी जैसे ॥ ९८ ॥ देखता है जब उलटकर । प्रतिबिंब बिंबको धनुर्धर । तब देखता सब मिटकर । रहता बिंब मात्र ॥ ९९ ॥ ७४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग