ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
यह पृथग्विध कारण । यहां जो कर्मका कारण । तीसरा है जान अर्जुन । इंद्रियां जो ॥ ३३० ॥ ४ कर्म-सिद्धिका कारण, भिन्न भिन्न क्रिया— होता है जैसे एक ही नीर । पूर्व पश्चिममें बहकर । कहलाता है पांडुकुमार । नदी नद जैसे ॥ ३१ ॥ तथा जैसे एकही पुरुष । अनुकरणसे नव रस । होता जैसे नवविध भास । उसी प्रकार ॥ ३२ ॥ प्राण वायुकी अखंड क्रिया शक्ती । अन्यान्य स्थान पर जो बिखुरती । अन्यान्य नामसे पहचानी जाती । शतरूप लेकर ॥ ३३ ॥ जब वह वाणीमें आती । तब वाक्शक्ति कहलाती । जब हाथोंमें उतरती । बनती व्यापार ॥ ३४ ॥ तथा चरणोंमें आकर । वही गति कहलाकर । उतरती है अधोद्वार । होती क्षरण ॥ ३५ ॥ नाभिकंदसे जो हृदय । करता प्रणव उदय । कहलाती है धनंजय । वह प्राण ॥ ३६ ॥ फिर है ऊर्ध्वके अर्जुन । आवागमनके कारण । कहलाता वही उदान । उसी प्रकार ॥ ३७ ॥ • अधोरंध्रसे वह बहता । अपान नामसे जाना जाता । वही जब व्यापक हो जाता । कहलाता व्यान ॥ ३८ ॥ खाया हुवा अन्नका रस । शरीर भरता सरस । नहीं छोडता है विशेष । शरीर भाग ॥ ३९ ॥ सभी व्यापार जो ऐसे । होते हैं क्रिया कर्म ऐसे । कहते समान ऐसे । धनुर्धर ॥ ३४० ॥ उबासी छींक डकार । ऐसे होते जो व्यापार । नाग कूर्मादि कृकर । भिन्न नामसे ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४०
एवं वायुकी यह चेष्टा । एकही होती है सुभट । व्यापार भेदसे पलटा । होता है जो ॥ ४२ ॥ भिन्न भिन्न कार्यास्तव । वायुशक्ति जो पांडव । भिन्न होती है सदैव । कारण चौथा ॥ ४३ ॥ ५ कर्म-सिद्धिका कारण, दैव— ऋतुओंमें शरद सुंदर । शरदमें भी है सुधाकर । उसमें है योग धनुर्धर । पूर्णिमाका ॥ ४४ ॥ या वसंतमें भला आराम । आराममें भी प्रिय-संगम । उसमें भी होता आगम । उपचारोंका ॥ ४५ ॥ नाना कमलमें धनुर्धर । विकसन होता है सुंदर । उसमें भी होता है उभार । परागका ॥ ४६ ॥ वाचाका सौंदर्य है कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व । रसिकत्वमें है परतत्व । स्पर्श जैसे ॥ ४७ ॥ सभी वृत्तियोंका वैभव । बुद्धिही एक है पांडव । बुद्धिकी शोभा नित्य नव । सामर्थ्य इंद्रियोंका ॥ ४८ ॥ इंद्रिय मंडलका वैभव । शृंगार एक ही है पांडव । वह है जो अधिष्ठात्री दैव- । अनुकूलता ॥ ४९ ॥ तभी चक्षु आदि जो दस इंद्रिय । उन पर अनुग्रह धनंजय । सूर्यादि देवताओंका समुदाय । रहता है सदा ॥ ३५० ॥ ऐसा जो देव-वृंद अर्जुन । कहा पांचवा कर्म कारण । जानना यहां ऐसा श्रीकृष्ण । कहता है जो ॥ ५१ ॥ ऐसी जो सब कर्म खान । उसकी उत्पत्तिका कारण । बुद्धिगम्य हो ऐसा अर्जुन । कहा है यहां ॥ ५२ ॥ अब जिन हेतुके कारण । बढ़ती है जो कर्मकी खान । उसका सभी हेतु अर्जुन । कहूंगा मैं पांच ॥ ५३ ॥ ७४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥ विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य होता है— आता जब जब वसंत । होता नव-पल्लवका हेत । नव-पल्लव पुष्प हेत । पुष्प देता है फल ॥ ५४ ॥ या वर्षाको लाते मेघ । मेघसे वृष्टि प्रसंग । वृष्टिसे मिलते भोग । सस्य-सुखके ॥ ५५ ॥ या सूर्य अरुणको प्रसवता । अरुणसे सूर्य उदय होता । सूर्यसे सब विश्व उजलता । दिवस रूप ॥ ५६ ॥ वैसे ही है हेतु जो मन । संकल्प-भावका अर्जुन । संकल्प है वाचाका जान । जलाता दीप ॥ ५७ ॥ फिर वह वाचाकी मशाल । दिखाती कर्म-मार्ग सकल । सो खोलता कर्ता टंकसाल । कर्तृत्वकी तब ॥ ५८ ॥ शरीरादि यहां समुदाय । शरीर हेतु है धनंजय । होता है जैसे लोहका कार्य । लोहसे ही ॥ ५९ ॥ अथवा तंतुओंका ताना जैसे । मिलकर तंतुओंके बानेसे । कहलाता जब कपडा ऐसे । केवल हैं तंतु ॥ ३६० ॥ वैसे ही है मानवके देहका । रचता हेतु कर्म-मनादिका । रत्नसे ही बनता है रत्नका । उपहार जैसे ॥ ६१ ॥ यहां जो शरीरादि कारण । हेतु कैसे होता यह ज्ञान । जानना चाहता तो अर्जुन । सुन तू अब ॥ ६२ ॥ कारण और हेतुके मिलनसे कर्म-निर्माण होता है— अथवा सूर्य प्रकाशके जैसा । हेतु कारण सूर्य ही है वैसा । या ईखका कांड है ईख जैसा । बढनेका कारण ॥ ६३ ॥ काया वाचा मनसे जो विश्वमें करता नर । धर्म या अधर्मका हो उसके पांच हेतु हैं ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४२
वाग्देवताका अनेक वर्णन । वाचा ही करती है ऐसे जान । अथवा वेद ही प्रतिष्ठापन । करते वेदोंका ॥ ६४ ॥ वैसे ही कर्मका शरीरादिक । कारण जानते हैं स्वाभाविक । किंतु यही हेतु नहीं है चूक । इस स्थानपे ॥ ६५ ॥ तथा देहादिक जो कारण । तथा देहादि हेतु मिलन । होनेसे सभी कर्म निर्माण । होते उसके ॥ ६६ ॥ सब जो वह शास्त्र सम्मत । मार्ग अनुसरता है पार्थ । तब न्यायसे है न्यायोचित । होता है हेतु ॥ ६७ ॥ जैसे वर्षा नीरका बडा बहाव । सहज शालि-खेतमें जाता पांडव । सोखकर होता है वह अतीव । लाभ दायक ॥ ६८ ॥ या निकला रोषसे अकस्मात । द्वारकाकी राहपे चला पार्थ । चलना उसका न होता पार्थ । थकने पर भी ॥ ६९ ॥ होनेसे हेतु कारण मिलन । होता जहां अंधा कर्म उत्पन्न । उसे मिले शास्त्रोचित नयन । होता है न्याय ॥ ३७० ॥ दूधमें आया बडा उफान । तथा वह गिर गया जान । उसे यज्ञ कहना अर्जुन । नहीं उचित ॥ ७१ ॥ वैसे शास्त्र-सम्मतिके बिन । किया हुवा नहीं अकारण । तब चुराया हुवा जो धन । दानमें गया क्या ॥ ७२ ॥ बावन वर्णपर कौन । मंत्र है कह तू अर्जुन । नहीं उच्चारता बावन । वर्णको कौन यहां ॥ ७३ ॥ किंतु मंत्रकी कुशलता । जब तक नहीं जानता । उच्चार फल नहीं पाता । उसी प्रकार ॥ ७४ ॥ कारण हेतु योगसे । होता जो अचानकसे । शास्त्रकी सो कसौटीसे । नहीं उतरता ॥ ७५ ॥ तबभी सब कर्म होता ही है । किंतु वह होना योग्य नहीं है । वह जो अन्याय ही अन्याय है । ऐसाही मानना ॥ ७६ ॥ ७४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥ आत्मा कभी कर्ता नहीं होता— एवं कर्मके हैं पांच कारण । वैसेही पांच हेतु हैं अर्जुन । उसमें कहां आत्माका दर्शन । होता है तुझको ॥ ७७ ॥ नहीं होता सूर्य जैसे रूप अर्जुन । चक्षुरूपसे कराता प्रकाशमान । वैसे ही आत्मा नहीं होता कर्म जान । कराता वह प्रकट ॥ ७८ ॥ दर्पणमें जो है जैसे देखता । दर्पण औ' प्रतिबिंब न होता । किंतु इनको है प्रकाश देता । देखकर जो ॥ ७९ ॥ अथवा अहोरात्र सविता । न होके करता पांडुसुता । वैसे आत्मा नहीं कर्म कर्ता । किंतु दिखाता है ॥ ३८० ॥ किंतु देहाहंकारके भ्रमसे । बुद्धिके देह ही मैं माननेसे । आत्म-विषयमें उसको जैसे । हुई मध्य रात्री ॥ ८१ ॥ जिसने चैतन्य ईश्वर ब्रह्म । किया हो देह ही सीमा परम । उसको आत्मा कर्ता ऐसा भ्रम । होता निश्चित ॥ ८२ ॥ किंतु आत्मा ही है कर्म-कर्ता । ऐसा भी निश्चय नहीं होता । शरीर ही मैं हूं कर्म-कर्ता । मानता सत्य ॥ ८३ ॥ आत्मा ही मैं कर्मातीत । सर्व कर्म साक्षीभूत । यह जो यथार्थ बात । न सुने कानसे ॥ ८४ ॥ इसीलिये अमाप आत्माको जहां । देहमें ही सीमित करता यहां । उलूक रातकोही दिवस जहां । मानता है वैसे ॥ ८५ ॥ जिसने आकाशका कहीं । सच्चा सूर्य देखा ही नहीं । वह गढेके बिंबकोही । मानके सूर्य ॥ ८६ ॥ वहां जो शुद्ध आत्माको कर्ता मान बसा हुवा । संस्कार हीन जो मूढ न जाने तत्त्व दुर्मति ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४४
डबरेका उत्पन्न होना । सूर्यकी उत्पत्ती मानना । उसके नाशमें नाशना । कांपनेसे कंप ॥ ८७ ॥ अजी ! सोता जब नहीं जगता । तब स्वप्नको ही सत्य जानता । रज्जू न जान सांपसे डरता । इसमें क्या विस्मय ॥ ८८ ॥ जब है आंखोंमें ही कामला । तब चंद्र भी दीखता पीला । मृग भी नहीं क्या मृगजल । देख भ्रमते हैं ॥ ८९ ॥ शास्त्र या गुरुका नाम धनुर्धर । रखता है गांवकी सीमाके पार । लेकर वह मूर्खताका ही आधार । जीता रहता है ॥ ३९० ॥ उस देहाभ्र - दृष्टिके कारण । आत्मापे पड़ता देहावरण । अभ्रवेग चंद्रमें आरोपण । करते हैं जैसे ॥ ९१ ॥ फिर इस मान्यताके कारण । देहकी बंदिशालामें अर्जुन । कर्मकी वज्रगांठमें बंधन । भोगता आप ॥ ९२ ॥ सुग्गा जैसे नलिका पर । आप बंधित मानकर । वस्तुतः स्वतंत्र होकर । फंसता है जैसे ॥ ९३ ॥ वैसे ही आत्म-स्वरूपपर । प्रकृति-गुणोंको थोप कर । कल्पकोटि तक धनुर्धर । कर्ममें फंसता ॥ ९४ ॥ किंतु जो कर्ममें रहता । कर्म उसको नहीं छूता । वडवानल जैसे होता । समुद्रोदकमें ॥ ९५ ॥ ऐसे जो कर्ममें भी अलिप्त । रहता कर्म कर सतत । जानना उसको कैसे पार्थ । कहता हूं अब ॥ ९६ ॥ करनेसे मुक्तका विचार । खुलता अपना मुक्ति-द्वार । दीप-प्रकाशमें देखकर । पाते वस्तु जैसे ॥ ९७ ॥ जैसे जैसे पोंछते हैं दर्पण । अपना आपको होता दर्शन । या पानीमें मिलकर लवण । होता पानी जैसे ॥ ९८ ॥ देखता है जब उलटकर । प्रतिबिंब बिंबको धनुर्धर । तब देखता सब मिटकर । रहता बिंब मात्र ॥ ९९ ॥ ७४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
वैसे खोया हुवा आप यदि पाना । संत जनोंमें ही वह देख लेना । इसीलिये है सुनना और गाना । संतोंका चरित्र ॥ ४०० ॥ वैसे कर्ममें भी रहके कर्ममें । लिप्त नहीं होता सब विषयमें । रहती जैसे चर्म-चक्षु चाममें । अलिप्त दृष्टि ॥ १ ॥ इस प्रकार जो मुक्त है । उसका रूप दिखाना है । हाथ उठाके कहना है । उपपत्तिको ॥ २ ॥ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमान् लोकान्न हंति न निबद्ध्यते ॥ १७ । अविद्या-निद्रामें डूब कर । विश्व-स्वप्नका जो व्यवहार । भोगता था प्रबुद्ध धनुर्धर । अनादि जो ॥ ३ ॥ महावाक्यसे तब पुकारकर । गुरु अनुग्रहके सामर्थ्यपर । जगाते हाथ रख मस्तक पर । या थपकाते ॥ ४ ॥ आत्मानुभवीका अनहंकारी देह भाव— तभी विश्व-स्वप्नकी माया । नींद छोड़के धनंजया । सहसा जगा जो अद्वय । आनंदमें ही ॥ ५ ॥ मृगजलके तब पूर । दीखते थे जो निरंतर । खो जाते जैसे चंद्रकर । फैलते ही ॥ ६ ॥ या बालत्व जब बीतता । हौवा कभी नहीं डराता । या स्वयंपाक नहीं बनता । आग बुझने पर ॥ ७ ॥ अथवा जगने पर जैसे । सपना नहीं दीखता वैसे । न होती अहं ममता उसे । पांडुकुमार ॥ ८ ॥ देखनेके लिये मानो अंधार । घुसता सुरंगमें भी भास्कर । फिर भी न दीखता वहां पर । अंधार उसको ॥ ९ ॥ नहीं जिसे अहंभाव बुद्धिमें लिप्तता नहीं । मारके विश्वको सारे न मारता न बंधता ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४६
वैसे जो आत्मत्वसे भरित । देखता जो कुछ भी समस्त । द्रष्टा-दृश्यत्व परिवर्तित । होता अपनेमें ॥ ४१० ॥ लगती जिसको आग । अग्नि ही बनता अंग । दाह्य दाहक विभाग । रहता नहीं ॥ ११ ॥ वैसे ही जो कर्म है भिन्न । लाता आत्मापे कर्तापन । जाता है आभास-बंधन । तब जो रहता ॥ १२ ॥ इस आत्म-स्थितिका जो राव । जाने क्या फिर देहका ठाव । प्रलयांबुधि पूर पांडव । मानता क्या ओघ ॥ १३ ॥ वैसे ही संपूर्ण अहंता । शरीर कैसे लपेटता । सूर्य-प्रभा होगी क्या सीमित । सूर्य बिंबमें ॥ १४ ॥ मथकर निकाला जो नवनीत । फिर छासमें डाला तो पार्थ । रहता है जिस भांति अलिप्त । उसी प्रकार ॥ १५ ॥ जैसे जो अग्नि काष्ठमें रहता । जब वह काष्ठसे भिन्न होता । फिर क्या काष्ठ-पेटीमें रहता । सिकुड करके ॥ १६ ॥ या जो रात्रीके गर्भसे । निकला भास्कर जैसे । बात वह सुने कैसे । रातकी कभी ॥ १७ ॥ तथा जो ज्ञाता ज्ञेयपन । निगल बैठा है अर्जुन । उसे देहाहंताका भान । होगा कैसे ॥ १८ ॥ जहां कहींसे गगन । भर रहा है संपूर्ण । भर रहना लक्षण । सहज उसका ॥ १९ ॥ ऐसा वह जो करता । वह सबं जो स्वयं होता । फिर कौन उसे लोपता । कर्तापनसे ॥ ४२० ॥ देहाहंकार आत्म-बोधमें विलय होनेके बाद— न रहता आकाश बिन ठाव । उसी भांति सागरको प्रवाह । तथा ध्रुवका उठना पांडव । रहता कहां ॥ २१ ॥ ७४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
उसका देहाहंकारका भाव । बोधमें विलय हुवा पांडव । फिर भी जो शरीरका स्वभाव । होते हैं कर्म ॥ २२ ॥ चलकर रुकता यदि चंड मारुत । फिर भी वृक्षोंमें रहता कंप भारत । तथा संदूकमें होता कर्पूर समाप्त । किंतु रहती सुगंध ॥ २३ ॥ हो जाता है संगीतका कार्यक्रम । किंतु चित्तपे रहता परिणाम । बहाव बह जाता है किंतु नम । रहता है भूमिका ॥ २४ ॥ अस्त होने पर भी सूर्यका । रहती है संध्याकी भूमिका । तथा ज्योति दीप्ति सकौतुक । दीखती है ॥ २५ ॥ लक्ष-भेद होने पर । दौडता रहता तीर । जब तक धनुर्धर । रहती शक्ति ॥ २६ ॥ चक्र पर मटका बन जाता । कुम्हार उसको उठा भी लेता । किंतु चक्र जो फिरता रहता । पहली गतिसे ॥ २७ ॥ वैसे ही देहाभिमान मिट जाता । जिस स्वभावसे है देह बनता । वही है देहको चेष्टित करता । अपने आप ॥ २८ ॥ संकल्प बिन जैसे स्वप्न दीखता । बनमें न लगता वृक्ष उगता । अथवा गंधर्व-नगर बनता । बनाये बिना ही ॥ २९ ॥ वैसे आत्माके उद्यम बिन । देहादि जो है पांच कारण । अपने आपही है अर्जुन । करते हैं कर्म ॥ ४३० ॥ विदेहावस्थामें किये गये मुक्त-कर्म- रहते हैं जो प्राचीन संस्कार । पांच कारण हेतु धनुर्धर । कराते कर्म अनेक प्रकार । शरीरादिसे ॥ ३१ ॥ उन कर्ममेंसे फिर । होता है विश्व-संहार । या नव-विश्व सुंदर । होता सृजन ॥ ३२ ॥ किंतु कुमुद जैसे सूखता । या कमल कैसे विकसता । यह दोनों रवि न देखता । उसी प्रकार ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४८
या वज्र प्रहार कर गगन । तुकडे करे भूतल अर्जुन । या मेघ-वर्षासे नंदनवन । बनाये यह भूमि ॥ ३४ ॥ किंतु इन दोनोंको जैसे । न जानता आकाश वैसे । देहमें रहती है वैसे । विदेह दृष्टि ॥ ३५ ॥ देहादिमें चेष्टा न करता । या विश्व बनता या टूटता । यह भी वह नहीं देखता । जैसे जगता स्वप्न ॥ ३६ ॥ किंतु जो चर्म-चक्षु देखते । तथा देह-भावसे है देखते । वे कर्म करता ऐसे कहते । तथा मानते ऐसे ॥ ३७ ॥ या घाससे बिजूखा बनाते । किसान खेती पर रखते । उसे सस्य-रक्षक जानते । पंछी सियार ॥ ३८ ॥ पागल पहना हुवा या नंगा । जैसे दूसरा ही कोई देखेगा । युद्धमें वीरके घाव गिनेगा । दूसरा कोई ॥ ३९ ॥ अथवा महासतीके भोग । देखता रहता सदा जग । किंतु आगमें जलना अंग । न देखता कोई ॥ ४० ॥ अजी ! स्वस्वरूपमें जो जागृत । दृश्य सह द्रष्टा हुवा है अस्त । वह जाने क्या इंद्रियोंकी बात । क्या करते वह ॥ ४१ ॥ बडे कल्लोलमें जब छोटा कल्लोल । समेटते तब किनारेके सकल । मनमें मानते यदि गया निगल । बडा छोटेको ॥ ४२ ॥ किंतु पानीकी दृष्टिसे देख वहां । कौन निगलेगा किसको औ' कहां । वैसे पूर्णको अन्य नहीं है जहां । वह मारेगा ॥ ४३ ॥ जैसे सुवर्णकी ही दुर्गा । तथा सुवर्णका ही खड्ग । उससे जो है नाश होगा । सुवर्ण महिष ॥ ४४ ॥ पूजारीकी दृष्टिसे व्यवहार । यह सब सही है धनुर्धर । किंतु खड्ग दुर्गा महिषासुर । तीनो हैं सुवर्ण ॥ ४५ ॥ जैसे चित्रका पानी हुताश । दृष्टि मात्रका यह आभास । चित्रमें आग या आर्द्र अंश । नहीं दोनों ही ॥ ४६ ॥ ७४९ सर्वगीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
मुक्तात्माका शरीर वैसा । चलता है संस्कारवश । देखके लोक भ्रमवश । कहते हैं कर्ता ॥ ४७ ॥ तथा उसके करनेसे पार्थ । होता यदि तीनों लोकका घात । किंतु उसने किया ऐसी बात । कहना नहीं ॥ ४८ ॥ ज्ञानीकी बुद्धि द्वंद्वातीत होती है— न देख कर सूर्यने कभी अंधार । नाश किया कहना कैसे धनुर्धर । जब ज्ञानियोंको नहीं कुछ दूसरा । कहेगा क्या ॥ ४९ ॥ इसीलिये ज्ञानीकी जो बुद्धि । न जाने पाप पुण्य अशुद्धि । मिलकर जैसे गंगा नदी । न रहता दोष ॥ ४५० ॥ आगका आगसे स्पर्श होकर । कौन जलेगा कहो धनुर्धर । अपने आपको है हथियार । चुभेगा क्या ॥ ५१ ॥ वैसे जो अपनेसे कुछ भिन्न । न मानता कर्म मात्र अर्जुन । नहीं होगी उसकी बुद्धि जान । लिप्त कभी किसीसे ॥ ५२ ॥ इसीलिये कार्य कर्ता क्रिया । अपना रूप जिसका भया । नहीं देहादिक धनंजया । न रहा कर्म-बंध ॥ ५३ ॥ स्वकर्तृत्वसे जीव कारीगर । पांच ही खाने सब खोद कर । दशेंद्रियोंसे करता तैयार । कर्म-मात्र ॥ ५४ ॥ वहां विधि तथा निषेध । साधके आकार द्विविध । कर्म-रचनामें विविध । न खोता क्षण भी ॥ ५५ ॥ इतना बडा यह कार्य । न होता आत्माका सहाय । प्रारंभमें भी धनंजय । न छूता वह ॥ ५६ ॥ केवल साक्षीभूत चिद्रूप । कर्म-प्रवृत्तिका जो संकल्प । उठता उसे प्रेरणा आप । नहीं देता ॥ ५७ ॥ कर्म-प्रवृत्तिका जो भार । न होता वह धनुर्धर । उस प्रवृत्तिका जो भार । उठाते अन्य ॥ ५८ ॥ तभी आत्माका जो केवल । रूप ही हुवा है निखिल । उसको नहीं बंदिशाल । कर्मकी कमी ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५०
किंतु जहां अज्ञानके पट पर । अन्यथा ज्ञानका चित्र उठाकर । दिखानेमें प्रसिद्ध धनुर्धर । त्रिपुटी जो अन्य ॥ ४६० ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन— जो है ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । जगके ये बीज त्रय । कर्मकी ये निःसंशय । प्रवृत्ति जो ॥ ६१ ॥ अब जो यह है तीन । विषय हैं भिन्न भिन्न । उनका करें वर्णन । स्पष्ट रूपसे ॥ ६२ ॥ जैसे जीव सूर्य-बिंबका । रश्मिजाल जो श्रोत्रादिका । खिलाते विषय पद्मका । मुकुल-वृंद ॥ ६३ ॥ जीव नृपका घोड़ा खुला हुवा । इंद्रियोंका समूह लिया हुवा । विषय देश लूटता पांडवा । सुखदुःखादिक ॥ ६४ ॥ इन इंद्रियोंसे कराता व्यापार । सुखदुःखानुभव देता लाकर । सुषुप्ति कालमें जो लीन होकर । रहता है ज्ञान ॥ ६५ ॥ उस जीवको कहते ज्ञाता । इसको मैं अब जो कहता । पहले छंदमें जो कहा था । वह है ज्ञान ॥ ६६ ॥ अविद्याके उदरमें । उपजते समयमें । कर देता जो आपमें । तीन भाग ॥ ६७ ॥ फिर अपनी दौड़के सम्मुख । बांध डालते ज्ञेय विषयक । पीछेका भाग जो है ज्ञातृत्वका । उठा देता है ॥ ६८ ॥ ज्ञाता ज्ञेयके मध्यमें फिर । ज्ञानके रहनेका प्रकार । जिससे दोनोंका व्यवहार । चलता रहता है ॥ ६९ ॥ ज्ञाता ज्ञेय तथा कर्म तिहरा कर्म-बीज है । क्रिया कारण कर्तृत्व तीन कर्मांग है उसे ॥ १८ ॥ ७५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आते ही ज्ञेयका सीमा-स्थान । जिसकी दौड सकती जान । तभी सभी वस्तुको अर्जुन । देता है नाम ॥ ४७० ॥ कहाता यह सामान्य ज्ञान । इसमें अन्यथा नहीं जान । सुन तू ज्ञेयका अब लक्षण । मुझसे अब ॥ ७१ ॥ अजी ! शब्द स्पर्श । रूप गंध रस । ये पांच आभास । ज्ञेयके हैं ॥ ७२ ॥ एक ही अमृत फल जैसे । इंद्रियोंको भिन्न रूपसे । रस वर्ण गंध स्पर्शसे । मिलता है ॥ ७३ ॥ ऐसे ज्ञेय है एकसर । किंतु ज्ञान इंद्रिय द्वारा । लेता तब होते प्रकार । यहां पांच ॥ ७४ ॥ प्रवाहका जैसे समुद्रमें जाना । रुकना पड़ावके आनेपे चलना । भुट्टा आने पर बढ़ना रुकना । सस्यका पार्थ ॥ ७५ ॥ इंद्रियोंसे ऐसे जो दौडता । वह ज्ञान जहां है रुकता । उसीको है ज्ञेय कहा जाता । धनुर्धर यहां ॥ ७६ ॥ ऐसे हैं ये ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । तीन रूप हुए धनंजय । यह सब है त्रिविध क्रिया । प्रवृत्तिकी जान ॥ ७७ ॥ जो है शब्दादि विषय । यह पंचविध ज्ञेय । वही है प्रिय अप्रिय । एक प्रकारसे ॥ ७८ ॥ ज्ञाताको जिस समय ज्ञान । करता है अल्पसा दर्शन । स्वीकार या तजनेमें अर्जुन । होता प्रवृत्त ॥ ७९ ॥ किंतु जैसे मीन देख बक । तथा निदान देखके रंक । अथवा स्त्रीको देख कामुक । होता प्रवृत्त ॥ ४८० ॥ अथवा उतार पर नीर । परिमल पर है भ्रमर । या गायके पास धनुर्धर । दौडता बछडा ॥ ८१ ॥ स्वर्गकी उर्वशीका विषय । सुनकर जैसे धनंजय । नभमें सीढी लगाता मनुष्य । यज्ञ यागकी ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५२
आकाशमें उड़ता कबूतर । कबूतरीको वहां देखकर । छोड़ता अपना सारा शरीर । उसपे जैसे ॥ ८३ ॥ अथवा सुनकर मेघ गर्जन । मयूर उड़ना चाहता गगन । वैसे ही ज्ञेय देखकर अर्जुन । दौड़ता ज्ञाता ॥ ८४ ॥ इसीलिये ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता । विविध हैं जो पांडुसुता । होते हैं यहां कर्मको समस्त । प्रवृत्त सदैव ॥ ८५ ॥ होता है यदि ज्ञेय प्रिय । ज्ञाताको वह धनंजय । भोगमें न खोता समय । क्षणका भी वह ॥ ८६ ॥ तथा होता यदि अप्रिय । तजता सबका समय । आया जैसे जग-प्रलय । मानता वह ॥ ८७ ॥ व्याल है अथवा हार । इस संशयमें नर । हर्षसे डालता कर । औ' कांप उठता ॥ ८८ ॥ ऐसे है ज्ञेयका प्रियाप्रिय । देख होता ज्ञाता धनंजय । स्वीकार या तजते समय । होता है प्रवृत्त ॥ ८९ ॥ अनुरागी जो प्रतिमल्लका । सेनापति संपूर्ण सैन्यका । आता है त्याग कर रथका । भूमि पर जैसे ॥ ४९० ॥ वैसे ज्ञातापनसे जो होता । वह कर्तापनमें है आता । नितही जो अनायास खाता । बैठता रसोईमें ॥ ९१ ॥ या भ्रमका ऐसे बाग लगाता । स्वर्णकारही कसौटी बनता । या भगवंत ही है राज बनता । घड़ने मंदिर ॥ ९२ ॥ ज्ञेयकी लालसा धर ऐसे । ज्ञाता कराता है इंद्रियोंसे । व्यवहार सभी प्रकारसे । होकर कर्ता ॥ ९३ ॥ तथा स्वयं आप होकर कर्ता । ज्ञानमें लाता जब सधनता । वहां ज्ञेयही होता स्वभावता । कार्य धनंजय ॥ ९४ ॥ ज्ञानकी ऐसी निजगति । पलटती जो इस भांति । रात्रिमें जैसे नेत्र-कांति । पलटती है ॥ ९५ ॥ अथवा होता जब वैष उदास । उतरता है श्रीमंतका विलास । पूर्णिमाके नंतर जैसे चंद्रांश । उतरता आता ॥ ९६ ॥ (87) ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
वैसे इस चेष्टाके कारण । ज्ञाताको घिरता कर्तापन । वहांके जो उसके लक्षण । सुन तू अब ॥ ९७ ॥ अंतःकरणका विवेचन— यहां बुद्धि और मन । चित्त अहंकार जान । ये हैं चतुर्विध चिन्ह । अंतःकरणके ॥ ९८ ॥ बाहर त्वचा और श्रवण । नयन रसना और घ्राण । ये हैं जो पंच-विध अर्जुन । ज्ञानकी इंद्रिया ॥ ९९ ॥ तब जो कर्ता जीव अर्जुन । ले अंतःकरणके साधन । करके कर्मका विचारण । यदि वह सुख हो ॥ ५०० ॥ जगा करके तब बाह्य । चक्षुरादि दस इंद्रिय । कर्ममें वह धनंजय । लगता त्वरित ॥ १ ॥ फिर वह इंद्रिय कवृंब । लगा देता है कर्ममें सब । जब तक कर्म-फल लाभ । हाथ न आता ॥ २ ॥ या किसी कर्तव्यमें सुख । फलेगा वह नहीं देख । कर देता है पराङ्मुख । इंद्रियोंको वह ॥ ३ ॥ जब तक लगान नहीं मिलता । राजा किसानको काममें जुताता । वैसे दुखका नाम भी न मिटता । जोतता इंद्रियोंको ॥ ४ ॥ कर्ता कारण और कर्म— ऐसे त्याग और स्वीकार । इंद्रियोंकी धुराको धर । करता उसे धनुर्धर । कहते हैं कर्ता ॥ ५ ॥ तथा कर्ताके सभी काम । करते जो स-परिश्रम । उन इंद्रियोंको हम । कहते हैं कारण ॥ ६ ॥ इन्ही कारणों पर जो कर्ता । सभी क्रियाओंको उभारता । उन क्रियाओंसे जो घिरता । वह है कर्म ॥ ७ ॥ सुनारकी बुद्धिसे जैसे आभूषण । घिरते चंद्रको जैसे चंद्रकिरण । तथा विलासतासे लता वृक्षगण । घेरते जैसे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५४
या नाना प्रभा जैसे प्रकाश । या मधुरतासे इक्षु-रस । या आकाश जैसे अवकाश । घिरा रहता है ॥ ९ ॥ वैसे कर्ताकी सभी क्रिया । व्याप लेती है धनंजय । उसको कर्म नाम दिया । अन्यको नहीं ॥ ५१० ॥ ऐसे कर्ता कर्म कारण । इन तीनोंके जो लक्षण । कहे हैं तुझसे अर्जुन । चातुर्यनिधि ॥ ११ ॥ यहां ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय । ये हैं कर्मके प्रवृत्तित्रय । वैसे ही कर्ता कारण कार्य । कर्म संचय यह ॥ १२ ॥ अग्निमें रखा जैसे धूम । तथा बीजमें जैसे द्रुम । वैसे मनसे जुडा काम । सदैवही ॥ १३ ॥ वैसे कर्म क्रिया कारण । कर्मका रहा है जीवन । जैसे सुवर्ण ही जीवन । स्वर्णमात्रका ॥ १४ ॥ इसीलिये यह कार्य मैं कर्ता । ऐसे भाव यहां है पांडुसुता । वहां भी आत्मा दूरही रहता । सभी क्रियाओंसे ॥ १५ ॥ इसीलिये जान तू अर्जुन । आत्मा रहता कर्मसे भिन्न । जाने दे अब यह कथन । सुनेगा कितना तू ॥ १६ ॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥ ज्ञान कर्म कर्ता भी त्रिगुणसे घिरे हैं— किंतु कहा जो ज्ञान । कर्म कर्ता ये तीन । इनमें गुण तीन । भिन्न हैं जो ॥ १७ ॥ इसलिये ज्ञान कर्म कर्ता । इसी पर न भूलना पार्था । एक है जो छुटकारा देता । और दो बंधन ॥ १८ ॥ ज्ञान औ' कर्म कर्तामें तीन भेद त्रिगुणसे । रचे हैं सुन तू कैसे गुण तत्त्वज्ञने कहे ॥ १९ ॥ ७५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
वह सात्विक तुझसे ज्ञात । इसलिये त्रिगुणकी बात । सांख्य शास्त्रमें जो है कथित । कहता हूं तुझे ॥ १९ ॥ वह विचार क्षीर समुद्र । स्वबोध कुमुदिनीका चंद्र । ज्ञान-जागृतोंका जो नरेंद्र । शास्त्रोंका है ॥ ५२० ॥ अथवा प्रकृति पुरुष ये दोन । घुल गये जैसे रात और दिन । त्रिभुवनमें उसे दिखाता कर भिन्न । मार्तंड जैसे ॥ २१ ॥ जहां मोहरात्री है अपार । चोवीस तत्त्वोंसे गिनकर । निरास करके धनुर्धर । रहे सुखसे ॥ २२ ॥ अर्जुन ! यह सांख्यशास्त्र । पढते हैं जिसके स्तोत्र । वह गुण भेद चरित्र । है इस भांति ॥ २३ ॥ अपने ही गुण भेदसे । त्रिविधपनकी मुद्रासे । विश्वमें जो दृश्य है उसे । किया मुद्रित ॥ २४ ॥ सत्व रज तम हैं ऐसे । तीनोंकी महिमा भी ऐसे । विविध जो आदि ब्रह्मासे । अंतमें है कृमितक ॥ २५ ॥ किंतु है विश्वके सभी समुदाय । जिसके भेदसे भेदते समय । उस ज्ञानका कैसे हुवा उदय । पहले उसे कहता ॥ २६ ॥ दृष्टिको जब शुद्ध किया जाता । तब सभी है शुद्ध ही दीखता । वैसे ही जब ज्ञान शुद्ध होता । सब है शुद्ध ॥ २७ ॥ इसीलिये वह सात्विक ज्ञान । कहता हूं उसको अब सुन । ऐसे हैं कैवल्य गुण निधान । श्रीकृष्ण कहता ॥ २८ ॥ सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥ अब कहता मैं तुझसे अर्जुन । शुद्ध जो वास्तविक सात्विक ज्ञान । उदयसे नाश करता है जान । ज्ञेय सह ज्ञानको ॥ २९ ॥ जो देखे भूत मात्रोंमें भाव एक सनातन । अभिन्न भेदमें देख जान जो ज्ञान सात्विक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ७५६
सात्त्विक ज्ञानका विवेचन— न देखता जैसे सूर्य अंधार । सरिता नहीं जानती सागर । आत्म-छाया न आती धनुर्धर । आलिंगनमें कभी ॥ ५३० ॥ इस भांति है जो ज्ञान । शिवादि गणावसान । इसे भूत व्यक्ति भिन्न । नहीं दीखता ॥ ३१ ॥ हाथसे चित्र देखनेसे । या नून पानीमें धोनेसे । या स्वप्न जैसे जगनेसे । नहीं दीखता ॥ ३२ ॥ इस प्रकार है जिस ज्ञानसे । ज्ञातव्य जाननेके प्रयाससे । ज्ञाता जानना या जानता ऐसे । नहीं रहता कुछ ॥ ३३ ॥ जैसे भूषण गलाके स्वर्ण । नहीं निकालते बुद्धिमान । तथा तरंग छान अर्जुन । नहीं लेते नीर ॥ ३४ ॥ जैसे ज्ञानके हाथमें पार्था । नहीं लगती है दृश्य-कथा । वह ज्ञान जान तू सर्वथा । सात्विक ज्ञान ॥ ३५ ॥ सहज देखनेसे जैसे दर्पण । आप देता प्रतिबिंब हो दर्शन । वैसे ज्ञेय दूर हो ज्ञाता अर्जुन । देता अनुभव ॥ ३६ ॥ ऐसा है जो सात्त्विक ज्ञान । मोक्ष-लक्ष्मीका है सदन । अब तू राजसका सुन । लक्षण पार्थ ॥ ३७ ॥ पृथक्त्वेन' तु तज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥ राजस ज्ञानका विवेचन— तमी यह जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्रसे हीन । श्रुतिने उसे मानके नग्न । किया अनादर ॥ ३८ ॥ भूतोंकी विचित्रताके कारण । स्वयं आप होकर छिन्न भिन्न । उस भेदसे ज्ञानीको अर्जुन । किया भ्रमिष्ट ॥ ३९ ॥
पोसके भेद बुद्धीको देखता भूतमात्रमें । विभिन्न भाव जो ज्ञान वह राजस जान तू ॥ २१ ॥ ७५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
जैसे है सच्चे रूप पर । लगाके विस्मयका द्वार । फिर वह स्वप्नका भार । होता निद्रामें ॥ ५४० ॥ वैसे स्व-ज्ञान सीमाके बाहर । असार संसार पंजर पर । तीन अवस्थाओंके धनुर्धर । दिखाता खेल ॥ ४१ ॥ अलंकार रूपमें ढका स्वर्ण । बालक नहीं समझता स्वर्ण । नाम-रूपसे दूर गया मान । अद्वैत जिससे ॥ ४२ ॥ भांडोंके रूपमें आकर । मृत्तिका गयी छिपकर । अथवा दीप बनकर । अग्नि हुवा दुर्बोध ॥ ४३ ॥ अथवा वस्त्रके रूपमें जैसे । मूर्खको तंतु खो जाते वैसे । अथवा चित्रका रूप लेनेसे । खो जाता वस्त्र ॥ ४४ ॥ उसी प्रकार है जो ज्ञान । जानता भूतमात्र भिन्न । तथा ऐसा बोध कल्पना । भूलही गया ॥ ४५ ॥ ईंधनसे भेदा गया अनल । तथा फूलोंसे मानो परिमल । अथवा जलभेदमें सकल । भिन्न हुवा चंद्र ॥ ४६ ॥ तथा वस्तुके नाना प्रकार । देखके छोटे बडे आकार । अनेकत्व देखता अंतर । राजस ज्ञान ॥ ४७ ॥ कहता अब तमका लक्षण । कराता हूं उसकी पहचान । तम जैसे चांडालका स्थान । दिखा रखता ॥ ४८ ॥ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ तामसिक ज्ञानका विवेचन— तब है जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्र हीन । श्रुति पराङ्मुख है नग्न । इसी लिये उसे ॥ ४९ ॥ देहको मान सर्वस्व व्यर्थ ही उलझा रहा । भावार्थ हीन जो क्षुद्र ज्ञान है जान तामस ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५८
अन्य शास्त्र जो श्रुत्यागम रत । तामस ज्ञानको मानके निंदित । भगा दिया है पर्वत पर पार्थ । म्लेंछ - धर्मके ॥ ५५० ॥ अजी ! जो ज्ञान है ऐसा । गुण ग्रहण तामस । पागल होकर जैसा । भटकता है ॥ ५१ ॥ नात - गोतकी बाधा न जानता । किसीको निषिद्ध नहीं मानता । मानो खंडहरमें बसा कुत्ता । रहता जैसे ॥ ५२ ॥ उसके मुखमें जो नहीं आता । अथवा खानेसे मुख जलता । ऐसे वस्तुमात्र वह तजता । खाता है सब और ॥ ५३ ॥ सोना चुराते हुए चूहा । भला बुरा न कहता पांडव । न कहता मांसाहारमें जीव । काला या गोरा ॥ ५४ ॥ या जलती जब आग वनमें । भला बुरा न सोचती मनमें । न सोचे माखी जैसे बैठनेमें । मरा या जिया है ॥ ५५ ॥ परोसा हुवा है या वमन । अथवा ताजा या बासी अन्न । जैसे यह भी कागका मन । नहीं जानता वैसे ॥ ५६ ॥ निषिद्धको है तजना । विधिको सदा पालना । इस विषयका ज्ञान । न रहता उसे ॥ ५७ ॥ आंखोंके सामने जो जो आता । वह भोग्य हेतु ही मानता । जो कुछ भी द्रव्य है मिलता । देता शिश्न देवको ॥ ५८ ॥ न तीर्थातीर्थका कुछ ज्ञान । पानीकी न कोई पहचान । प्यासका मुख इसके बिन । न जानता कुछ ॥ ५९ ॥ वैसे ही वह खाद्याखाद्य । न जानता निंद्य - अनिंद्य । जीभको भाता वही योग्य । वह मानता है ॥ ५६० ॥ मानता स्त्री-जात सकल । भोग्य वस्तु ही है केवल । इस विषयमें केवल । यही बोध ॥ ६१ ॥ स्वार्थमें जो जब काम आता । वही उसका आप बनता । अन्य संबंध नहीं जानता । वह कभी कोई ॥ ६२ ॥ सभी होता है मृत्युका अन्न । तथा होता आगका ईंधन । वैसे ही होता विश्वका धन । तामस ज्ञानीको ॥ ६३ ॥ ७५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग